सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना महामारी के कारण आर्थिक समस्याओं से जूझ रहीं सेक्स वर्करों की समस्याओं का संज्ञान लेते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को उनकी मदद का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने एक एनजीओ की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को सैक्स वर्करों से पहचान का सबूत मांगे बिना उन्हें मासिक राशन और नकद हस्तांतरण की सुविधा मुहैया कराने का तरीका खोजने का आदेश दिया।
केंद्र और राज्य सरकारों को कोरोना महामारी को ध्यान में रखकर कदम उठाने को कहा
जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, एनजीओ की याचिका में उठाया गया मुद्दा तत्काल ध्यान देने लायक है। केंद्र की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल आरएस सूरी और राज्य सरकारों के वकीलों को पीठ ने निर्देश दिया कि वे अपनी-अपनी सरकार से सेक्स वर्करों को बिना पहचान पत्र के मासिक राशन व नकदी मुहैया कराने का तरीका पूछकर बताएं।
जस्टिस राव के अलावा जस्टिस हेमंत गुप्ता की मौजूदगी वाली पीठ कोलकाता के दरबार महिला समन्वय कमेटी नामक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने पूरे देश में 9 लाख से ज्यादा महिला व ट्रांसजेंडर सेक्स वर्करों के भुखमरी की हालत में पहुंच जाने का दावा किया था। याचिका में इसे संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले सम्मान से जीने के अधिकार का उल्लंघन करार दिया था।
एनजीओ की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने पीठ को बताया था कि 96 फीसदी सेक्स वर्करों की आय महामारी के कारण बंद हो गई है। इसके बाद मामले में एमिकस क्यूरी बनाए गए वरिष्ठ वकील जयंत भूषण ने बिना पहचान पत्र के सरकारी राशन कार्ड उपलब्ध कराए जाने से ये समस्या हल होने की सलाह पीठ को दी थी।