शीर्ष अदालत ने 12 अगस्त को कविता की उन याचिकाओं पर ईडी और सीबीआई से जवाब मांगा था, जिनमें दोनों मामलों में उन्हें जमानत देने से इनकार करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि वह दिल्ली आबकारी नीति में कथित घोटाले से जुड़े धन शोधन मामले में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) की नेता के कविता की जमानत अर्जी पर 22 अगस्त तक जवाब दाखिल करेगी। ईडी और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ को बताया कि मामले में सीबीआई का जवाबी हलफनामा पहले ही दाखिल किया जा चुका है। राजू ने कहा कि ईडी का जवाबी हलफनामा 'तैयार किया जा रहा है' और इसे 22 अगस्त तक दाखिल कर दिया जाएगा। इसके बाद पीठ ने मामले की सुनवाई 27 अगस्त तक के लिए टाल दी।
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हाईकोर्ट के फैसले को दी गई है चुनौती
शीर्ष अदालत ने 12 अगस्त को कविता की उन याचिकाओं पर ईडी और सीबीआई से जवाब मांगा था, जिनमें दोनों मामलों में उन्हें जमानत देने से इनकार करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय ने दोनों मामलों में कविता की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वह प्रथम दृष्टया दिल्ली आबकरी नीति 2021-22 के निर्माण एवं कार्यान्वयन से जुड़ी आपराधिक साजिश की मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक प्रतीत होती हैं। यह नीति बाद में रद्द कर दी गई थी।
मार्च में के कविता को किया गया था गिरफ्तार
सीबीआई और ईडी ने आबकारी नीति के निर्माण एवं कार्यान्वयन में कथित भ्रष्टाचार और धन शोधन को लेकर अलग-अलग मामले दर्ज किए हैं। ईडी ने कविता (46) को 15 मार्च को हैदराबाद के बंजारा हिल्स स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया था। वहीं, सीबीआई ने भ्रष्टाचार के मामले में उन्हें 11 अप्रैल को तिहाड़ जेल से गिरफ्तार किया था। कविता ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है।
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जाति व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित करने संबंधी याचिका खारिज
उच्चतम न्यायालय ने जाति व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित करने के निर्देश देने का अनुरोध करने वाली याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनता। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, संविधान में शुरुआत से ही अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का उल्लेख है। उच्चतम न्यायालय वजीर सिंह पूनिया द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें कहा गया था कि जाति व्यवस्था मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।
ओबीसी दर्जा मामला: सुप्रीम कोर्ट पहुंची ममता सरकार, 27 अगस्त को सुनवाई
पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में कई जातियों, ज्यादातर मुस्लिम समूहों को ओबीसी का दर्जा देने से मना करने वाले कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पश्चिम बंगाल सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपनी अपील पर तत्काल सुनवाई की मांग की। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस मुद्दे पर 27 अगस्त को याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ के समक्ष पश्चिम बंगाल सरकार के वकील कपिल सिब्बल ने बताया कि हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की जरूरत है क्योंकि यह नीट-यूजी 2024 पास करने वाले उम्मीदवारों के प्रवेश को प्रभावित कर रहा है। छात्रवृत्ति का मुद्दा लंबित है और नीट में प्रवेश प्रभावी होंगे। उन्होंने कहा कि याचिका पर दिन में सुनवाई की जाए। राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) पैनल का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वकील ने कहा कि छात्र मेडिकल कॉलेजों और अन्य संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए अपनी ओबीसी स्थिति के प्रमाणीकरण के लिए कतार में हैं। सीजेआई ने कहा, हम इस पर मंगलवार (27 अगस्त) को सुनवाई करेंगे।
शीर्ष अदालत ने 5 अगस्त को राज्य सरकार से कहा था कि वह ओबीसी सूची में शामिल की गई नई जातियों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर मात्रात्मक डाटा उपलब्ध कराए। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की याचिका पर निजी वादियों को नोटिस जारी करते हुए, शीर्ष अदालत से एक हलफनामा दाखिल करने को कहा था। जिसमें 37 जातियों, ज्यादातर मुस्लिम समूहों को ओबीसी सूची में शामिल करने से पहले उसके और राज्य के पिछड़ा वर्ग पैनल द्वारा किए गए परामर्श, यदि कोई हो, का विवरण दिया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को एक सम्मेलन के हिस्सा लेने लिए 31 अगस्त से 10 सितंबर तक मलयेशिया जाने की अनुमति दे दी। शीर्ष अदालत ने तीस्ता को एक शपथपत्र दाखिल करने को कहा कि वह निर्धारित समय पर भारत लौट आएंगी। शीर्ष अदालत ने पिछले साल जुलाई में उन्हें 2002 के गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के मामलों में निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए दस्तावेज तैयार करने मामले में नियमित जमानत दी थी।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के समक्ष तीस्ता के वकील कपिल सिब्बल ने कहा, पिछले साल जमानत देते वक्त शीर्ष अदालत ने पासपोर्ट सत्र अदालत में जमा कराने की शर्त लगाई थी। मेरे मुवक्किल को एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए मलयेशिया जाना है। सिब्बल ने तीस्ता को विदेश यात्रा करने की अनुमति देने की मांग की। गुजरात सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें अदालत के समक्ष एक हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा जाना चाहिए। पीठ ने मेहता की दलील पर गौर किया कि यह जरूरी है कि उन पर कुछ शर्तें लगाई जाएं ताकि मुकदमे का सामना करने के लिए उनकी वापसी सुनिश्चित हो सके।
तीस्ता को मलेशिया जाने की अनुमति देते हुए पीठ ने कहा कि उनका पासपोर्ट उन्हें लौटा दिया जाए। साथ ही पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को इस अदालत के समक्ष एक शपथपत्र दाखिल करना होगा कि वह निर्धारित समय पर भारत लौट आएंगी और मुकदमे का सामना करेंगी। उन्हें सत्र अदालत की संतुष्टि के लिए 10 लाख रुपये की जमानत भी देनी होगी। मलयेशिया से लौटने पर सीतलवाड़ को अपना पासपोर्ट फिर से ट्रायल जज के पास जमा कराना होगा।