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SC Updates: 'अराजकता पैदा होगी..', पंजाब में पंचायत चुनाव में मतदान पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

Tue, 15 Oct 2024 08:20 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब में पंचायत चुनावों के लिए जारी मतदान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर पंचायत चुनाव के लिए आज सुबह आठ बजे शुरू हुए मतदान पर रोक लगाई जाती है तो अराजकता पैदा होने का खतरा है।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कल को इसी तरह कोई संसदीय चुनाव पर रोक लगाने की मांग रख देगा। हम इस मामले को लिस्ट कर लेते हैं, लेकिन मतदान पर कोई रोक नहीं होगी। 

गौरतलब है कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में वार्डबंदी, एक ही परिवार के वोट अलग-अलग वार्ड में बनने और एनओसी के विषय पर दायर लगभग एक हजार से अधिक याचिकाएं दायर हुई थीं। हालांकि, कोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज कर पंजाब में पंचायत चुनाव का रास्ता साफ कर दिया है। साथ ही गत सप्ताह 270 पंचायतों के चुनाव पर लगाई गई रोक हटा दी। हालांकि कोर्ट ने कुछ याचिकाओं में चुनाव की वीडियोग्राफी की मांग को स्वीकार कर लिया है। इसके बाद आज (15 अक्तूबर) को पंजाब में पंचायत चुनाव आयोजित हुए। 
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मुफ्त स्कीम के वादों पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र-चुनाव आयोग को नोटिस

मुफ्त रेवड़ियां...नई याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब
 सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की तरफ से विभिन्न तरह की सौगातों का वादा किए जाने के चलन के खिलाफ एक नई याचिका पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। याचिका में कहा गया कि राजनीतिक दलों को चुनावी सौगातों के वादे करने से रोकने के लिए निर्वाचन आयोग (ईसी) को प्रभावी कदम उठाने का निर्देश दिया जाए।

सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने बंगलूरू निवासी शशांक जे. श्रीधारा की याचिका पर नोटिस जारी करने के साथ ही इस मामले को अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ ही जोड़ दिया। याचिका में कहा गया है कि मुफ्त की रेवड़ियां बांटे जाने के बेलगाम वादे सरकारी राजकोष पर बेहिसाब वित्तीय बोझ डालते हैं। इसके अलावा, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई तंत्र नहीं है कि चुनाव पूर्व किए वादे पूरे किए जाएं।

मुफ्त उपहारों के वादों को रिश्वत घोषित करें
याचिका में राजनीतिक दलों के मुफ्त उपहारों के वादों को रिश्वत घोषित करने की मांग भी की गई है। इसमें कहा गया कि विधानसभा या आम चुनावों के दौरान राजनीतिक दल मुफ्त उपहारों, खासकर नगदी संबंधी वादे करने, जिन्हें उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर सरकारी खजाने से वित्तपोषित किया जाएगा, के लिए ऐसे राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 को रिश्वतखोरी का जिम्मेदार ठहराया गया।

सोमनाथ भारती की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का यूपी सरकार को फिर नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती की याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को नया नोटिस जारी किया है। दरअसल, भारती पर राज्य में अस्पतालों और स्कूलों की स्थिति पर कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप है। इस मामले में उन्होंने कोर्ट से अपने खिलाफ दर्ज केसों को स्थानांतरित करने की मांग की है।

भारती के खिलाफ एक मामला सुल्तानपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में है। उन्होंने इसे दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में ट्रांसफर करने का अनुरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने इस मामले में शिकायतकर्ता को भी नोटिस जारी किया और मामले की सुनवाई के लिए तीन हफ्ते बाद की तारीख तय की। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल तीन जुलाई को भारती के खिलाफ सुल्तानपुर अदालत में लंबित कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। इससे पहले पिछले साल 10 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर भारती द्वारा मामले को स्थानांतरित करने के अनुरोध वाली याचिका को लेकर कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी थी।

आप नेता की टिप्पणियों को लेकर उनके खिलाफ रायबरेली और अमेठी में दो मामले दर्ज किए गए थे।

एफआईआर रद्द कर जांच को नाकाम नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

 जब संज्ञेय अपराध का खुलासा तो जांच नहीं रोक सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब एफआईआर में किसी आरोपी पर बेईमानी का आरोप लगाया जाता है और सामग्री से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है तो एफआईआर को रद्द करके जांच को रोका नहीं जा सकता। यह एक सामान्य कानून है कि एफआईआर सभी आरोपों का विश्वकोश (एन्साइक्लोपीडिया) नहीं है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक कार्यवाही या एफआईआर को शुरू में ही रद्द करने का निर्णय लेते वक्त एफआईआर में लगाए गए आरोपों, जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री पर गौर किया जाना चाहिए। 

यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि जांच के लिए आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। पीठ ने सोमवार को दिये फैसले में कहा, इस प्रकार, जब प्राथमिकी में बेईमानी का आरोप लगाया गया है और पेश सामग्री इसके समर्थन में हो तो संज्ञेय अपराध का खुलासा होगा। ऐसे में प्राथमिकी को रद्द करके जांच को विफल नहीं किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने सोमजीत मलिक की अपील पर यह फैसला सुनाया। मलिक ने झारखंड हाईकोर्ट के 1 फरवरी के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एक आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी को रद्द कर दिया गया था। मलिक ने आरोप लगाया कि उनका ट्रक जुलाई 2014 से आरोपी के कब्जे में था, हालांकि, इसका किराया, जिसमें 12.49 लाख रुपये का बकाया भी शामिल है, का भुगतान नहीं किया गया था।

अस्पतालों में सुरक्षा चिंताओं को लेकर बनाई टास्क फोर्स के कामकाज से सुप्रीम कोर्ट नाराज

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अस्पतालों में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) पर नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने एनटीएफ की तरफ से बैठकें न करने को लेकर असंतुष्टि जताई। 

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने पाया कि राष्ट्रीय कार्यबल की पहली बैठक 27 अगस्त को हुई थी। इसमें राज्यों में अस्पतालों के इन्फ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा सिस्टम और स्वास्थ्य कर्मियों की स्थिति सुधारने के अलावा कानूनों को मजबूत करने पर चर्चा हुई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई की 9 सितंबर के बाद से एनटीएफ की कोई बैठक नहीं हुई। 

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर एनटीएफ ने 9 सितंबर के बाद क्या किया। आखिर किसी भी मामले में कोई प्रगति क्यों नहीं हुई। उन्हें काम को आगे बढ़ना चाहिए।

इसे लेकर सरकार का पक्ष रख रहे वकील तुषार मेहता ने कोर्ट को एफिडेविट में एनटीएफ के कदमों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि एनटीएफ के सामने काफी काम है और भरोसा दिया कि देश के स्वास्थ्यकर्मियों की समस्याओं का जल्द हल खोज लिया जाएगा। इस पर कोर्ट ने कहा कि एनटीएफ की बैठकें समय-समय पर होती रहनी चाहिए।
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कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को किया सूचित
कर्नाटक सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि उसने तीन ग्रामीण जिलों में चालू शैक्षणिक वर्ष में कक्षा 5, 8 और 9 के छात्रों के लिए बोर्ड परीक्षा आयोजित करने की अपनी अधिसूचना वापस ले ली है।  न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ कर्नाटक उच्च न्यायालय के 22 मार्च के फैसले के खिलाफ गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त स्कूलों के संगठन द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी।

जानकारी के अनुसार उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश की पीठ के 6 मार्च के आदेश को खारिज करते हुए राज्य सरकार को शैक्षणिक वर्ष 2023-24 के लिए कक्षा 5, 8, 9 और 11 के लिए बोर्ड परीक्षा आयोजित करने की अनुमति दी थी। जहां उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने कर्नाटक राज्य परीक्षा और मूल्यांकन बोर्ड (केएसईएबी) के माध्यम से इन कक्षाओं के लिए बोर्ड परीक्षा आयोजित करने के राज्य सरकार के अक्टूबर 2023 के फैसले को रद्द कर दिया था।
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