नाबालिगों के किए गए अनुबंध कानून के तहत स्वीकार्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि नाबालिगों के किए गए अनुबंध कानून के तहत स्वीकार्य नहीं हैं। जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें नाबालिगों के साथ किए गए बिक्री समझौतों को अमान्य घोषित कर दिया था। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में अपीलकर्ता (नाबालिग) के तर्क में कोई विवाद नहीं है कि 3 सितंबर 2007 को जब समझौता हुआ तब वह नाबालिग था। इसलिए, हाईकोर्ट ने इस समझौते को अमान्य करार देने में कोई गलती नहीं की है। इस तरह प्रतिवादी (विक्रेता) व अपीलकर्ता (नाबालिग) के बीच अचल संपत्ति की खरीद के समझौते से जुड़े विवाद का निपटारा किया गया।
वितरकों के लाभ पर टीडीएस कटौती टेलिकॉम कंपनियों के लिए जरूरी नहीं- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिम कार्ड या प्रीपेड कूपन बेचकर लाभ कमाने वाले वितरकों से स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) करना टेलिकॉम कंपनियों के लिए कानून रूप से बाध्यकारी नहीं है।
जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने आयकर विभाग और भारती एयरटेल लिमिटेड दोनों की ओर से दायर याचिका और प्रति याचिका पर बुधवार को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इस फैसले का देश की सभी टेलिकॉम कंपनियों और उनके वितरकों पर व्यापक असर होगा। पीठ के सामने यह कानूनी बिंदु विचार के लिए लाया गया था कि भारती एयरटेल के वितरकों या फ्रेंचाइजी की ओर से ग्राहकों को बेचे गए प्रीपेड कूपन और सिम कार्ड से कमाए गए लाभ पर आयकर कानून की धारा 194एच के तहत कर कटौती की जिम्मेदारी किसकी है। आयकर विभाग का दावा था कि वितरक जो लाभ कमाते हैं वो दरअसल आयकर आकलक (कंपनी) और उसकी फ्रेंचाइजी के बीच हुए एग्रीमेंट के तहत हासिल कमीशन है।
हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के पक्ष में सुनाया था फैसला : पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले जस्टिस खन्ना ने कहा, हम यह मानते हैं कि आयकर कानून के तहत टेलिकॉम कंपनियां इस तरह के लाभ पर टीडीएस काटने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं। फैसले में कहा गया है कि आयकर कानून की धारा 194एच इस तरह के केस पर लागू नहीं होता। इससे पहले दिल्ली और कलकत्ता हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के पक्ष में जबकि राजस्थान, कर्नाटक और बॉम्बे हाईकोर्ट ने टेलिकॉम कंपनियों के पक्ष में फैसला दिया था।