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SC Updates: जेलों में बंद रोहिंग्या शरणार्थियों को रिहा करने की याचिका पर मार्च में सुनवाई, पढ़ें बड़ी खबरें

Thu, 29 Feb 2024 02:12 PM IST
श्वेता महतो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शीर्ष अदालत ने पिछले साल 10 अक्तूबर को केंद्र को नोटिस जारी करते हुए चार हफ्तों के भीतर उनकी प्रतिक्रियां मांगी थी। प्रशांत भूषण याचिकाकर्ता प्रियाली सूर की तरफ से पेश हुए।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अवैध तरीके से जेलों और हिरासत केंद्रों में बंद रोहिंग्या शरणार्थियों को रिहा करने के लिए सरकार को निर्देश देने वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है। वकील प्रशांत भूषण ने इस मामले का जिक्र करते हुए बताया कि मामले को सुनवाई तय नहीं की गई है। इसके बाद जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हुई। 
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सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि वह इस मामले की सुनवाई मार्च में करेगा। शीर्ष अदालत ने पिछले साल 10 अक्तूबर को केंद्र को नोटिस जारी करते हुए चार हफ्तों के भीतर उनकी प्रतिक्रिया मांगी थी। प्रशांत भूषण याचिकाकर्ता प्रियाली सूर की तरफ से पेश हुए। प्रियाली सूर ने याचिका में बताया कि रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन राज्य के अल्पसंख्यक है। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें दुनिया के सबसे ज्यादा उत्पीड़ित जातीय अल्पसंख्यक बताया है।

याचिका में कहा गया कि रोहिंग्या शरणार्थी उत्पीड़न से बचने के लिए भारत समेत अन्य पड़ोसी देशों में भाग गए। गर्भवती महिलाओं और नाबालिगों सहित सैकड़ों रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत की जेलों और हिरासत केंद्रों में गैरकानूनी और अनिश्चित काल तक हिरासत में रखा गया है।
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वेदांता को राहत नहीं, कॉपर प्लांट फिर से खोलने की अर्जी खारिज वेदांता समूह को बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। वेदांता की ओर से बार-बार पर्यावरण मानदंडों के कथित उल्लंघन और इसके संचालन के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बंद किए गए तूतीकोरिन (तमिलनाडु) के स्टरलाइट कॉपर स्मेल्टिंग प्लांट को फिर से खोलने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने अगस्त, 2020 के मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ वेदांता लि. की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को खारिज कर दिया। फैसले में कंपनी के तूतीकोरिन के तांबा संयंत्र को बंद करने के तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से पारित परिणामी आदेश के खिलाफ याचिकाओं के एक समूह को खारिज कर दिया गया था। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि अदालत को अच्छी तरह से स्थापित सिद्धांतों के प्रति सचेत रहना होगा, जिसमें सतत विकास के सिद्धांत, प्रदूषण फैलाने वाले सिद्धांत और सार्वजनिक विश्वास सिद्धांत शामिल हैं।

नाबालिगों के किए गए अनुबंध कानून के तहत स्वीकार्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि नाबालिगों के किए गए अनुबंध कानून के तहत स्वीकार्य नहीं हैं। जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें नाबालिगों के साथ किए गए बिक्री समझौतों को अमान्य घोषित कर दिया था। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में अपीलकर्ता (नाबालिग) के तर्क में कोई विवाद नहीं है कि 3 सितंबर 2007 को जब समझौता हुआ तब वह नाबालिग था। इसलिए, हाईकोर्ट ने इस समझौते को अमान्य करार देने में कोई गलती नहीं की है। इस तरह प्रतिवादी (विक्रेता) व अपीलकर्ता (नाबालिग) के बीच अचल संपत्ति की खरीद के समझौते से जुड़े विवाद का निपटारा किया गया।
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वितरकों के लाभ पर टीडीएस कटौती टेलिकॉम कंपनियों के लिए जरूरी नहीं- सुप्रीम कोर्ट 
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिम कार्ड या प्रीपेड कूपन बेचकर लाभ कमाने वाले वितरकों से स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) करना टेलिकॉम कंपनियों के लिए कानून रूप से बाध्यकारी नहीं है।
  जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने आयकर विभाग और भारती एयरटेल लिमिटेड दोनों की ओर से दायर याचिका और प्रति याचिका पर बुधवार को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इस फैसले का देश की सभी टेलिकॉम कंपनियों और उनके वितरकों पर व्यापक असर होगा। पीठ के सामने यह कानूनी बिंदु विचार के लिए लाया गया था कि भारती एयरटेल के वितरकों या फ्रेंचाइजी की ओर से ग्राहकों को बेचे गए प्रीपेड कूपन और सिम कार्ड से कमाए गए लाभ पर आयकर कानून की धारा 194एच के तहत कर कटौती की जिम्मेदारी किसकी है। आयकर विभाग का दावा था कि वितरक जो लाभ कमाते हैं वो दरअसल आयकर आकलक (कंपनी) और उसकी फ्रेंचाइजी के बीच हुए एग्रीमेंट के तहत हासिल कमीशन है।  
हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के पक्ष में सुनाया था फैसला : पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले जस्टिस खन्ना ने कहा, हम यह मानते हैं कि आयकर कानून के तहत टेलिकॉम कंपनियां इस तरह के लाभ पर टीडीएस काटने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं। फैसले में कहा गया है कि आयकर कानून की धारा 194एच इस तरह के केस पर लागू नहीं होता। इससे पहले दिल्ली और कलकत्ता हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के पक्ष में जबकि राजस्थान, कर्नाटक और बॉम्बे हाईकोर्ट ने टेलिकॉम कंपनियों के पक्ष में फैसला दिया था।
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