सुप्रीम कोर्ट ने एक दुर्लभ आदेश में मणिपुर सरकार को निर्देश दिया कि वह 26 मई को यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए अपने हिंसा प्रभावित पहाड़ी जिलों से राज्य से बाहर जाने वाले अभ्यर्थियों को प्रति दिन की दर से 3,000 रुपये का भुगतान करे। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने राज्य के पहाड़ी जिलों के सिविल सेवा अभ्यर्थियों की शिकायतों पर गौर किया। इन अभ्यर्थियों ने सुरक्षा चिंताओं के कारण मणिपुर के बाहर परीक्षा केंद्रों का विकल्प चुना है। पीठ ने आदेश में कहा, जो व्यक्ति वर्तमान में पहाड़ी जिलों में रह रहे हैं और यूपीएससी परीक्षा के लिए आवेदन किया है, उन्हें प्रति दिन की दर से 3000 रुपये का भुगतान किया जाएगा। ताकि ऐसे उम्मीदवार परीक्षा में शामिल होने के लिए राज्य के बाहर यात्रा कर सकें। इस लाभ को प्राप्त करने के इच्छुक किसी भी उम्मीदवार को आदेश में दिए गए ईमेल पर उनके वर्तमान जिले के नोडल अधिकारी को सूचित करना होगा। पीठ 140 छात्रों की ओर से मणिपुर के बाहर परीक्षा केंद्र स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
शीर्ष अदालत बोली- संविधान पीठ का फैसला छोटी पीठों पर बाध्यकारी; सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2022 का फैसला वापस लिया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान पीठ का निर्णय कम संख्या वाली पीठों पर बाध्यकारी होगा। शीर्ष अदालत ने हरियाणा के एक गांव के निवासियों के सामान्य उपयोग की भूमि से संबंधित मामले में अपने अप्रैल 2022 के फैसले को वापस लेते हुए यह टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने 7 अप्रैल, 2022 के अपने आदेश में कहा था कि कोई पंचायत उस जमीन के स्वामित्व का दावा नहीं कर सकती है जो हरियाणा में भूमि कानून के तहत वास्तविक मालिकों से उनकी मंजूर सीलिंग सीमा से अधिक होने पर ली गई है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि पंचायतें केवल उस भूमि का प्रबंधन और नियंत्रण कर सकती हैं जो मालिकों से ली गई हैं और उस पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकती हैं। शीर्ष अदालत ने यह फैसला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के फैसले के खिलाफ दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुनाया था। हाईकोर्ट ने हरियाणा ग्राम सामान्य भूमि (विनियमन) अधिनियम, 1961 की धारा 2(जी) की उपधारा 6 की वैधता की समीक्षा की थी। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने बृहस्पतिवार को दिए अपने फैसले में कहा कि हाईकोर्ट का फैसला 1966 में शीर्ष अदालत की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ की ओर से निर्धारित कानून पर आधारित था। ऐसे में समीक्षाधीन फैसले में इस अदालत से कम से कम यही उम्मीद थी कि वह बताती कि 1966 के फैसले पर भरोसा करने में हाईकोर्ट क्यों गलत था। पीठ ने कहा, यह बताने के लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं है कि संविधान पीठ का निर्णय कम संख्या वाली पीठों पर बाध्यकारी होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने नीट के नतीजों पर रोक से किया इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) 2024 के परिणाम जारी करने पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया। दरअसल, शीर्ष कोर्ट में एक याचिका दायर कर इस साल प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के बाद परीक्षा दोबारा आयोजित कराने की मांग की गई है। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि वह अखिल भारतीय परीक्षा को नहीं रोक सकती। हालांकि, कोर्ट ने याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मंागा है। पीठ ने कहा, हम यह मामला ग्रीष्मावकाश के बाद देखेंगे। याचिका वंशिका यादव की तरफ से दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि राजस्थान में अखबारों की रिपोर्टों से पता चला कि परीक्षा से पहले पेपर लीक हो गया था।
प्रचार के लिए सोरेन की अंतरिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनाव में प्रचार करने के लिए झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अंतरिम जमानत की याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय से जवाब मांगा है। ईडी को 20 मई तक अपना जवाब दाखिल करना है। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ अब सोरेन की याचिका पर मंगलवार (21) को सुनवाई करेगी। ईडी की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल(एएसजी) एसवी राजू ने कहा कि उनके पास सोरेन को विवादित भूमि से जोड़ने के लिए मजबूत सबूत हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की नियमित जमानत भी खारिज कर दी गई थी। सोरेन को ईडी ने 31 जनवरी को गिरफ्तार किया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान
कपिल सिब्बल व एसवी राजू के बीच तीखी बहस हुई। सिब्बल ने कहा, सोरेन को अंतरिम जमानत मिले तो वह 2 जून को सरेंडर कर देंगे। शेष बचे तीन चरणों के लिए 20 मई, 25 मई व 1 जून को मतदान होना है। उनके खिलाफ इस मामले में कोई सबूत भी नहीं हैं। अगर उन्हें अभी अंतरिम जमानत नहीं दी गई तो चुनाव खत्म हो जाएंगे। इस पर एसवी राजू ने जवाबी दलील में कहा, सोरेन को बहुत पहले गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने नियमित जमानत याचिका खारिज होने को चुनौती भी नहीं दी। मुझे जवाब देने के लिए वक्त दीजिये। सिब्बल ने फिर कहा, आप सभी दस्तावेज ले आइए। मैं पांच मिनट में साबित कर दूंगा कि सोरेन का इस जमीन से कोई लेना देना नहीं है। सिर्फ इसलिए कि किसी व्यक्ति ने कह दिया की जमीन मंत्री जी की है इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि वह जमीन सोरेन की है। मैं लिखित आवेदन देकर ईडी के तमाम साक्ष्यों को झूठा साबित कर दूंगा।
मतदाता गोपनीयता उल्लंघन के आरोप वाली अर्जी खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को वह जनहित याचिका खारिज कर दी जिसमें मौजूदा मतदान प्रणाली में मतदाता गोपनीयता के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने याचिका खारिज करने के साथ ही कहा कि याचिकाकर्ता ने शायद शीर्ष अदालत का 26 अप्रैल का फैसला नहीं पढ़ा है। शीर्ष कोर्ट ने उसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में हेराफेरी किए जाने की संभावनाओं को खारिज कर दिया था। पीठ ने कहा कि अगर 26 अप्रैल का फैसला देखा होता तो ऐसी दलील नहीं देते। याचिकाकर्ता एग्नोस्टस थियोस की तरफ से अधिवक्ता ने कहा कि एक निर्वाचन अधिकारी वीवीपैट पर्ची और ईवीएम में संग्रहीत डेटा देख सकता है। वीवीपैट पर्चियों और ईवीएम डाटा से अधिकारी यह जान सकता है कि किस मतदाता ने किस पार्टी को वोट दिया।
मतों का लेखा-जोखा तुरंत अपलोड करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट
देशभर में चुनावी माहौल बना हुआ है। चार चरण के लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। अब पांचवें चरण का चुनाव 20 मई को होना है। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में मतदान केंद्रों पर दर्ज मतों का लेखा-जोखा तुरंत अपलोड करने का निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका दाखिल की गई। इसी मामले पर आज अदालत में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के वकील से कहा कि वह 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रत्येक चरण के मतदान समाप्त होने के बाद सभी मतदान केंद्रों पर दर्ज मतों का लेखा-जोखा तुरंत अपलोड करने के निर्देश मांगने वाली अर्जी पर चुनाव आयोग से निर्देश ले।