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Supreme Court: संविधान पीठ का फैसला छोटी पीठों पर बाध्यकारी; मणिपुर से बाहर UPSC परीक्षा के लिए 3000 दे सरकार

Fri, 17 May 2024 09:52 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई
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सुप्रीम कोर्ट ने एक दुर्लभ आदेश में मणिपुर सरकार को निर्देश दिया कि वह 26 मई को यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए अपने हिंसा प्रभावित पहाड़ी जिलों से राज्य से बाहर जाने वाले अभ्यर्थियों को प्रति दिन की दर से 3,000 रुपये का भुगतान करे। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने राज्य के पहाड़ी जिलों के सिविल सेवा अभ्यर्थियों की शिकायतों पर गौर किया। इन अभ्यर्थियों ने सुरक्षा चिंताओं के कारण मणिपुर के बाहर परीक्षा केंद्रों का विकल्प चुना है। पीठ ने आदेश में कहा, जो व्यक्ति वर्तमान में पहाड़ी जिलों में रह रहे हैं और यूपीएससी परीक्षा के लिए आवेदन किया है, उन्हें प्रति दिन की दर से 3000 रुपये का भुगतान किया जाएगा। ताकि ऐसे उम्मीदवार परीक्षा में शामिल होने के लिए राज्य के बाहर यात्रा कर सकें। इस लाभ को प्राप्त करने के इच्छुक किसी भी उम्मीदवार को आदेश में दिए गए ईमेल पर उनके वर्तमान जिले के नोडल अधिकारी को सूचित करना होगा। पीठ 140 छात्रों की ओर से मणिपुर के बाहर परीक्षा केंद्र स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

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शीर्ष अदालत बोली- संविधान पीठ का फैसला छोटी पीठों पर बाध्यकारी; सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2022 का फैसला वापस लिया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान पीठ का निर्णय कम संख्या वाली पीठों पर बाध्यकारी होगा। शीर्ष अदालत ने हरियाणा के एक गांव के निवासियों के सामान्य उपयोग की भूमि से संबंधित मामले में अपने अप्रैल 2022 के फैसले को वापस लेते हुए यह टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने 7 अप्रैल, 2022 के अपने आदेश में कहा था कि कोई पंचायत उस जमीन के स्वामित्व का दावा नहीं कर सकती है जो हरियाणा में भूमि कानून के तहत वास्तविक मालिकों से उनकी मंजूर सीलिंग सीमा से अधिक होने पर ली गई है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि पंचायतें केवल उस भूमि का प्रबंधन और नियंत्रण कर सकती हैं जो मालिकों से ली गई हैं और उस पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकती हैं। शीर्ष अदालत ने यह फैसला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के फैसले के खिलाफ दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुनाया था। हाईकोर्ट ने हरियाणा ग्राम सामान्य भूमि (विनियमन) अधिनियम, 1961 की धारा 2(जी) की उपधारा 6 की वैधता की समीक्षा की थी। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने बृहस्पतिवार को दिए अपने फैसले में कहा कि हाईकोर्ट का फैसला 1966 में शीर्ष अदालत की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ की ओर से निर्धारित कानून पर आधारित था। ऐसे में समीक्षाधीन फैसले में इस अदालत से कम से कम यही उम्मीद थी कि वह बताती कि 1966 के फैसले पर भरोसा करने में हाईकोर्ट क्यों गलत था। पीठ ने कहा, यह बताने के लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं है कि संविधान पीठ का निर्णय कम संख्या वाली पीठों पर बाध्यकारी होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने नीट के नतीजों पर रोक से किया इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) 2024 के परिणाम जारी करने पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया। दरअसल, शीर्ष कोर्ट में एक याचिका दायर कर इस साल प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के बाद परीक्षा दोबारा आयोजित कराने की मांग की गई है। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि वह अखिल भारतीय परीक्षा को नहीं रोक सकती। हालांकि, कोर्ट ने याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मंागा है। पीठ ने कहा, हम यह मामला ग्रीष्मावकाश के बाद देखेंगे। याचिका वंशिका यादव की तरफ से दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि राजस्थान में अखबारों की रिपोर्टों से पता चला कि परीक्षा से पहले पेपर लीक हो गया था।
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प्रचार के लिए सोरेन की अंतरिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से मांगा जवाब 
सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनाव में प्रचार करने के लिए झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अंतरिम जमानत की याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय से जवाब मांगा है। ईडी को 20 मई तक अपना जवाब दाखिल करना है। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ अब सोरेन की याचिका पर मंगलवार (21) को सुनवाई करेगी। ईडी की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल(एएसजी) एसवी राजू ने कहा कि उनके पास सोरेन को विवादित भूमि से जोड़ने के लिए मजबूत सबूत हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की नियमित जमानत भी खारिज कर दी गई थी। सोरेन को ईडी ने 31 जनवरी को गिरफ्तार किया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल व एसवी राजू के बीच तीखी बहस हुई। सिब्बल ने कहा, सोरेन को अंतरिम जमानत मिले तो वह 2 जून को सरेंडर कर देंगे। शेष बचे तीन चरणों के लिए 20 मई, 25 मई व 1 जून को मतदान होना है। उनके खिलाफ इस मामले में कोई सबूत भी नहीं हैं। अगर उन्हें अभी अंतरिम जमानत नहीं दी गई तो चुनाव खत्म हो जाएंगे। इस पर एसवी राजू ने जवाबी दलील में कहा, सोरेन को बहुत पहले गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने नियमित जमानत याचिका खारिज होने को चुनौती भी नहीं दी। मुझे जवाब देने के लिए वक्त दीजिये। सिब्बल ने फिर कहा, आप सभी दस्तावेज ले आइए। मैं पांच मिनट में साबित कर दूंगा कि सोरेन का इस जमीन से कोई लेना देना नहीं है। सिर्फ इसलिए कि किसी व्यक्ति ने कह दिया की जमीन मंत्री जी की है इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि वह जमीन सोरेन की है। मैं लिखित आवेदन देकर ईडी के तमाम साक्ष्यों को झूठा साबित कर दूंगा। 

मतदाता गोपनीयता उल्लंघन के आरोप वाली अर्जी खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को वह जनहित याचिका खारिज कर दी जिसमें मौजूदा मतदान प्रणाली में मतदाता गोपनीयता के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने याचिका खारिज करने के साथ ही कहा कि याचिकाकर्ता ने शायद शीर्ष अदालत का 26 अप्रैल का फैसला नहीं पढ़ा है। शीर्ष कोर्ट ने उसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में हेराफेरी किए जाने की संभावनाओं को खारिज कर दिया था। पीठ ने कहा कि अगर 26 अप्रैल का फैसला देखा होता तो ऐसी दलील नहीं देते। याचिकाकर्ता एग्नोस्टस थियोस की तरफ से अधिवक्ता ने कहा कि एक निर्वाचन अधिकारी वीवीपैट पर्ची और ईवीएम में संग्रहीत डेटा देख सकता है। वीवीपैट पर्चियों और ईवीएम डाटा से अधिकारी यह जान सकता है कि किस मतदाता ने किस पार्टी को वोट दिया। 

मतों का लेखा-जोखा तुरंत अपलोड करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट
देशभर में चुनावी माहौल बना हुआ है। चार चरण के लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। अब पांचवें चरण का चुनाव 20 मई को होना है। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में मतदान केंद्रों पर दर्ज मतों का लेखा-जोखा तुरंत अपलोड करने का निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका दाखिल की गई। इसी मामले पर आज अदालत में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के वकील से कहा कि वह 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रत्येक चरण के मतदान समाप्त होने के बाद सभी मतदान केंद्रों पर दर्ज मतों का लेखा-जोखा तुरंत अपलोड करने के निर्देश मांगने वाली अर्जी पर चुनाव आयोग से निर्देश ले।

वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़ी याचिका पर केंद्र को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एक याचिका पर नोटिस जारी किया है। याचिका में वैवाहिक दुष्कर्म को आपराधिक कानून में अपवाद के रूप में बनाए रखने को चुनौती दी गई। शीर्ष अदालत ने ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेन एसोसिएशन की याचिका पर नोटिस जारी किया और कहा कि इसे वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध बनाने की मांग करने वाली अन्य याचिकाओं के साथ जुलाई में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, यह एक सांविधानिक मुद्दा है।शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी, 2023 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के पत्नी के वयस्क होने पर जबरन यौन संबंध के लिए अभियोजन के खिलाफ पति को सुरक्षा प्रदान करने वाले प्रावधान के विरोध वाली याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था। आईपीसी की धारा 375 में दिए गए अपवाद के तहत, किसी पुरुष के उसकी बालिग पत्नी के साथ संभोग या यौन कृत्य को दुष्कर्म नहीं माना गया है। नए कानून - भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के अंतर्गत भी धारा 63 (दुष्कर्म) के अपवाद 2 में स्पष्ट किया गया है कि किसी व्यक्ति का अपनी ही पत्नी,(जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम न हो) के साथ यौन संबंध या यौन कृत्य दुष्कर्म नहीं है। नए बनाए गए कानून-भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1 जुलाई से लागू होंगे और ये आपराधिक न्याय प्रणाली को पूरी तरह से बदल देंगे।

तेजाब हमले के पीड़ितों की याचिका पर केंद्र, आरबीआई को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और अन्य को नोटिस जारी किया है। सभी को एक याचिका पर नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। याचिका में तेजाब हमले के पीड़ितों (एसिड अटैक सरवाइवर्स) के लिए एक वैकल्पिक डिजिटल केवाईसी प्रक्रिया की मांग की गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पादरीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिसरा की पीठ ने कहा है कि तेजाब हमले के नौ पीड़ितों की तरफ से दायर याचिका एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस मामले में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्यौगिकी मंत्रालय और अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। पीठ ने कहा ‘हम इसे लेकर नोटिस जारी कर रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और हम इस पर सुनवाई करेंगे।’ सुप्रीम कोर्ट में एसिड अटैक कार्कर्ता प्रज्ञा प्रसून और अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई की जा रही थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायाधीशों के लिए गुजरात हाईकोर्ट की पदोन्नति नीति को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने योग्यता-सह-वरिष्ठता के आधार पर अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश के पद पर पदोन्नति में सिविल न्यायाधीशों को 65 प्रतिशत कोटा प्रदान करने की गुजरात उच्च न्यायालय की नीति को बरकरार रखा है। 2005 के सेवा नियमों में बताया गया है कि राज्य में अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश कैडर में 65 प्रतिशत रिक्तियां योग्यता-सह-वरिष्ठता के आधार पर सिविल जज वाले फीडर कैडर से भरी जानी हैं। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। पीठ ने कहा कि 2011 से गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा अपनाई गई पदोन्नति की प्रक्रिया से भटकना न्यायिक अधिकारियों के लिए गंभीर पूर्वाग्रह का कारण बन सकता है। 

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फसलों पर कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल पर केंद्र से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने फसलों और खाद्य पदार्थों में जरूरत से ज्यादा कीटनाशकों के इस्तेमाल पर केंद्र सरकार, कृषि मंत्रालय, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण और अन्य से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने यह नोटिस उस याचिका पर जारी किया है जिसमें कहा गया है कि कीटनाशकों और अन्य रसायनों इस्तेमाल के कारण देशभर में तमाम लोगों की जान जा रही है। वरिष्ठ अधिवक्ता अनिता शेनॉय ने चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ को बताया कि याचिकाकर्ता ने देशभर से डेटा एकत्र किया है जिसमें कीटनाशकों के कारण होने वाली मौतों की संख्या बहुत अधिक है। शीर्ष अदालत वकील आकाश वशिष्ठ की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

इस याचिका में दावा किया गया है कि खाद्य फसलों और खाद्य पदार्थों पर कीटनाशकों और अकार्बनिक रासायनिक पदार्थों, जिनमें कीटनाशक, खरपतवारनाशी, कवकनाशी, शाकनाशी आदि शामिल हैं, का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल देश में कैंसर और अन्य घातक बीमारियां होने का एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है। एक बार जब भोजन या खाद्य फसल कीटनाशकों से दूषित हो जाती है, तो संपूर्ण खाद्य शृंखला में इसकी विषाक्तता तेजी से फैलती है।

एफएसएसएआई डेटा का हवाला देते हुए याचिका में बताया गया 2015-16 के दौरान विश्लेषण में 72,499 खाद्य नमूनों में से 16,133 मिलावटी या गलत ब्रांड वाले पाए गए। अधिकारियों ने 1,450 आपराधिक और 8,529 दीवानी मामले दर्ज किए, जिसमें 540 मामलों में सजा हुई। वहीं, 2016-17 में 78,340 नमूनों में से 18,325 नमूने मिलावटी या गलत ब्रांड वाले पाए गए। स्थिति इतनी गंभीर होने के बावजूद केंद्र सरकार कीटनाशकों के उपयोग को नियंत्रित करने में विफल रही है।
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