सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मणिपुर हिंसा से जुड़ी एक याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। दरअसल, मणिपुर ट्राइबल फोरम की ओर से दायर इस याचिका में मांग की गई थी कि राज्य में रहने वाले कुकी समुदाय की सुरक्षा की जिम्मेदारी भारतीय सेना को दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए याचिका पर तीन जुलाई को सुनवाई के लिए भेज दिया। कोर्ट ने कहा कि यह पूरी तरह कानून और व्यवस्था का मसला है। इस बीच केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि सुरक्षा एजेंसियां स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ दे रही हैं।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एमएम सुरेश की वैकेशन बेंच के सामने वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजालवेज ने मणिपुर ट्राइबल फोरम की याचिका का जिक्र किया था। वहीं, केंद्र की तरफ से इस मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से पक्ष रखा गया।
मणिपुर ट्राइबल फोरम ने आरोप लगाया है कि राज्य में कुकी सुरक्षित नहीं हैं। एनजीओ ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि वह केंद्र सरकार के झूठे आश्वासनों पर भरोसा न करे और कुकी समुदाय की सुरक्षा भारतीय सेना को सौंपी जाए। गौरतलब है कि मणिपुर में करीब एक महीने पहले शुरू हुई हिंसा में अब तक 100 लोगों की मौत हो चुकी है। कुकी और मैतेई समुदाय के बीच छिटपुट हिंसा की घटनाएं अभी भी जारी हैं।
कोर्ट ने फटकारा- समस्याएं न बढ़ाएं
गोंजालवेज ने कहा कि अदालत ने मामले को 17 जुलाई के लिए सूचीबद्ध किया है। तब तक 50 और लोग मारे जाएंगे। इस पर पीठ ने सवाल किया कि उनकी इस गणना का आधार क्या है। पीठ ने कहा, यह कानून-व्यवस्था का एक गंभीर मुद्दा है। आप इस तरह के तर्क पेश करके समस्या को बढ़ा सकते हैं। आप जिस क्षण यह कहते हैं कि वे इसे ठीक से नहीं कर रहे हैं, तो दरअसल आप समस्या को बढ़ा रहे होते हैं। गौरतलब है कि राज्य में मई के पहले हफ्ते में शुरू हुई हिंसक झड़पों के बाद से अब तक 115 लोग मारे जा चुके हैं।
मैतेई को आरक्षण के फैसले पर समीक्षा करेगा हाईकोर्ट
मणिपुर हाईकोर्ट ने 27 मार्च के अपने फैसले के खिलाफ उस समीक्षा याचिका को स्वीकार कर लिया है, जिसमें राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल करने की सिफारिश करने का निर्देश दिया गया था। मैतेई ट्राइब्स यूनियन (एमटीयू) की याचिका पर कार्यवाहक चीफ जस्टिस एमवी मुरलीधरन की पीठ ने सोमवार को केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस भी जारी किया है।
जस्टिस मुरलीधर ने ही 27 मार्च का आदेश लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि मैतेई समुदाय 2013 से कई बार केंद्र से एसटी दर्जे का अनुरोध कर चुका है। इस संबंध में केंद्रीय जनजाति मंत्रालय ने औपचारिक सिफारिश के लिए राज्य को अनुरोध भेजा था, लेकिन उसने कोई कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने इसके साथ ही राज्य सरकार को जल्द से जल्द मैतेई समुदाय को एसटी दर्जा देने पर विचार करने को कहा था।
यह दिया तर्क
एमटीयू आदेश के इसी हिस्से को संशोधित कराना चाहता है। उसका तर्क है कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्पष्ट करता है कि किसी समुदाय को यह दर्जा देना या न देना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, इसलिए निर्देश उस पर लागू नहीं होता। इसलिए राज्य को केंद्र के अनुरोध पर अपना जवाब देने का निर्देश दिया जाना चाहिए। समीक्षा याचिका पर अगली सुनवाई पांच जुलाई को होगी।
सीमित इंटरनेट सेवाएं बहाल करने का निर्देश
मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कुछ चुनींदा जगहों पर इंटरनेट की सीमित सेवाएं मुहैया कराने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा कि इंटरनेट लोगों के लिए आवश्यक है। खासकर ऐसे समय जब छात्रों की प्रवेश प्रक्रिया जारी है। जस्टिस अहनथेम बिमोल सिंह और जस्टिस ए गुनेश्वर शर्मा की पीठ ने यह आदेश शुक्रवार को इंटरनेट सेवाओं की बहाली संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया, लेकिन अधिवक्ता ने बताया कि इसकी जानकारी मंगलवार को सामने आई। वहीं, दूसरी तरफ राज्य सरकार ने इंटरनेट सेवा पर प्रतिबंध 25 जून तक बढ़ा दिया है।