सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालत राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति के लिए निर्धारित परामर्श प्रक्रिया से जुड़े व्यापक दिशानिर्देश जारी करेगी। मुख्यमंत्रियों, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और विपक्ष के नेताओं की ओर से ली जाने वाली परामर्श प्रक्रिया के लिए दिशानिर्देश तय करने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्ति से जुड़ी याचिका पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि नियुक्ति से पहले प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) से परामर्श नहीं किया गया।
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कही यह बात
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि इस मुद्दे के देशव्यापी असर को देखते हुए कुछ प्रक्रियागत तौर तरीके तय करने होंगे। पीठ ने कहा कि कानून में यह प्रावधान है कि नेता प्रतिपक्ष भी एक सदस्य होगा लेकिन फिर भी परामर्श प्रक्रिया के तौर तरीके तय करने होंगे। आपको उस व्यक्ति (नेता प्रतिपक्ष) को कम से कम नामों पर विचार विमर्श के लिए एक अवसर देना ही होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि उनसे सिर्फ यह कहा जाए कि उम्मीदवार को अपनी सहमति दे दें। इसका देशव्यापी प्रभाव है। ऐसे में हमें कुछ मानदंड तय करने होंगे अन्यथा समिति में नेता प्रतिपक्ष की मौजूदगी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
एमपी के नेता प्रतिपक्ष ने दाखिल की है याचिका
पीठ मध्य प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) कांग्रेस के उमंग सिंघार की उस याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें राज्य में लोकायुक्त के पद पर जस्टिस (सेवानिवृत्त) सत्येंद्र कुमार सिंह की नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि एलओपी से परामर्श नहीं किया गया। सिंघार के वकील कपिल सिब्बल ने इसे प्रक्रिया का पूरी तरह से मजाक बताया। प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श किया गया और पूरी फाइल नेता प्रतिपक्ष को भेजी गई थी।