सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में कहा है कि सड़क निर्माण एक बुनियादी ढांचा परियोजना है और विधायिका की मंशा को ध्यान में रखते हुए कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा है कि निविदा में रोक या हस्तक्षेप से राज्य को अतिरिक्त लागत आती है और यह जनहित के विरुद्ध भी है। इससे राज्य और उसके नागरिकों को दो बार नुकसान उठाना पड़ता है।
पहला लागत में हुई वृद्धि का भुगतान करके और दूसरा बुनियादी ढांचे से वंचित होने से। वर्तमान सरकारों से बुनियादी ढांचे पर काम करने की उम्मीद की जाती है। साथ ही यह भी कहा है कि अदालत को निविदा के अनुदान में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, भले ही वह पूरी तरह से मनमाना और दुर्भावना से ग्रस्त हो। जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम की पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि अनुबंध के निष्पादन पर रोक लगाने की बजाय गलत तरीके से बहिष्करण के लिए हर्जाना मांगने के लिए पार्टियों को आरोपित करना चाहिए।
निविदा में हस्तक्षेप या रोक से राज्य को अतिरिक्त लागत आती है। साथ ही यह जनहित के खिलाफ भी है। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक सेवा के किसी भी अनुबंध में हल्के ढंग से हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए और किसी भी मामले में व्यापक सार्वजनिक भलाई के लिए सेवाओं की पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतारने वाला कोई अंतरिम आदेश नहीं होना चाहिए। पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ अपील का निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की। दरअसल हाईकोर्ट ने निविदा के अनुदान को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को स्वीकार कर लिया था।
हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से जताई असहमति
झारखंड हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए पीठ ने इस सवाल पर कि क्या अनुबंध की अवधि आवश्यक है या नहीं, कहा है कि इसे नियोक्ता के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। चूंकि सड़क निर्माण एक बुनियादी ढांचा परियोजना है और विधायिका की मंशा को ध्यान में रखते हुए कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। हाईकोर्ट को बुनियादी ढांचा परियोजना के निर्माण पर रोक लगाने के लिए अपना हाथ ‘थामने’ की सलाह दी जाती है। संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए रिट कोर्ट को ऐसे प्रावधान को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अदालतों को तकनीकी मुद्दों से जुड़े अनुबंधों में हस्तक्षेप से बचना चाहिए
पीठ ने कहा कि इस मामले में अंतरिम निषेधाज्ञा (रोक) से केवल एक ठेकेदार को मदद मिली है, जिसने एक अनुबंध बोली खो दी। इससे केवल राज्य को नुकसान पहुंचा है, जिससे किसी को कोई लाभ नहीं हुआ है। पीठ ने कहा कि रिट कोर्ट को नियोक्ता के निर्णय पर अपना फैसला थोपने से बचना चाहिए कि निविदाकर्ता की बोली को स्वीकार किया जाए या नहीं?
न्यायालय के पास राज्य की वर्तमान आर्थिक गतिविधियों के नियमों और शर्तों की जांच करने की विशेषज्ञता नहीं है। इस सीमा को ध्यान में रखा जाना चाहिए। अदालतों को तकनीकी मुद्दों से जुड़े अनुबंधों में हस्तक्षेप करने में और भी अनिच्छुक होना चाहिए क्योंकि ऐसे मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। न्यायालय का दृष्टिकोण दोष खोजने के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि न्यायालय को इस बात की जांच करनी चाहिए कि क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया निविदा शर्तों द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप है?
यदि न्यायालय को यह लगता यह पूरी तरह से मनमाना है या गलत तरीके से निविदा प्रदान की गई है तो भी न्यायालय को निविदा के अनुदान में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा है कि अधिकार क्षेत्र के प्रयोग की कई चरण से निविदा को चुनौती देने वाले मामलों में अंतिम निर्णय आने में देरी होती हैं। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट या मुख्य न्यायाधीश इन याचिकाओं को हाईकोर्ट की एक खंडपीठ को सौंप सकते हैं, जिससे कम से कम एक मंच पर सुनवाई से बचा जा सकता है।