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सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: महामारी से प्रभावित बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी करें राज्य

Tue, 08 Jun 2021 05:35 PM IST
गौरव पाण्डेय राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना वायरस वैश्विक महामारी की वजह से माता या पिता या दोनों को खोने से तबाह हो चुके  बच्चों की जरूरतों और उनके कल्याण को लेकर कई निर्देश जारी किए हैं। पीठ ने सभी राज्यों को ऐसे बच्चों को विभिन्न योजनाओं के तहत वित्तीय लाभ प्रदान करने के लिए कहा है।
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सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को कोविड-19 महामारी के दौरान अनाथ हुए बच्चों की पहचान करना जारी रखने और उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरी करना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ऐसे बच्चों की सरकारी या निजी स्कूलों में शिक्षा जारी रहनी चाहिए।

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जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा, 'अनाथ होने वाले या माता-पिता में से किसी एक को खोने वाले बच्चों की पहचान करने के बाद बच्चों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए तत्काल कदम उठाया जाना चाहिए। जिला बाल संरक्षण अधिकारियों को ऐसे बच्चे से जल्द संपर्क करना चाहिए। जिला बाल संरक्षण इकाई यह सुनिश्चित करेगी कि बच्चे को राशन, भोजन, दवाइयां, कपड़े आदि की पर्याप्त व्यवस्था की जाए।' 




न्याय मित्र गौरव अग्रवाल के सुझाव को स्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे सरकारी और निजी, दोनों स्कूलों में बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए प्रावधान करें। 
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स्वत: संज्ञान मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए विस्तृत आदेश में पीठ ने राज्य सरकारों या केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे उन बच्चों की पहचान करना जारी रखें जो मार्च, 2020 के बाद या तो कोविड-19 या किसी अन्य कारणों से अनाथ हो गए या माता-पिता में से किसी एक को खो दिया। अदालत ने इस डाटा को बिना किसी देरी के एनसीपीसीआर की वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया है। 

शीर्ष अदालत ने कहा है कि प्रभावित बच्चों की पहचान चाइल्डलाइन (1098), स्वास्थ्य अधिकारियों, पंचायती राज संस्थानों, पुलिस अधिकारियों, गैर सरकारी संगठनों आदि के माध्यम से की जा सकती है। 

अदालत ने जिला बाल संरक्षण अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि वह प्रथम दृष्टया संतुष्ट नहीं है कि अभिभावक बच्चे की देखभाल करने में सक्षम है तो वह बच्चे को बाल कल्याण समिति(सीडब्ल्यूसी) के समक्ष पेश करें। सीडब्ल्यूसी को इसकी जांच के लिए किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015  के तहत बनाए गए नियमों के अनुसार कदम उठाने का निर्देश दिया गया है। जांच लंबित रहने के दौरान सीडब्ल्यूसी को बच्चे की बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखने का निर्देश दिया है।

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