जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने इस आधार पर दोषी की सजा को कम कर दिया कि यह नहीं कहा जा सकता कि दोषी में सुधार की संभावना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सात साल की बच्ची से दुष्कर्म व हत्या के दोषी एक व्यक्ति की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि हमारा मानना है कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं आता, जिससे कि दोषी को फांसी की सजा दी जाए। मामला उत्तर प्रदेश का है।
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जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने इस आधार पर दोषी की सजा को कम कर दिया कि यह नहीं कहा जा सकता कि दोषी में सुधार की संभावना नहीं है। क्योंकि दोषी का न तो कोई आपराधिक इतिहास रहा है और न ही वह दुर्दांत अपराधी था। हालांकि पीठ ने कहा कि 30 वर्ष की सजा काटने के बाद ही दोषी समय पूर्व रिहाई या रियायत पाने का हकदार होगा।
जेल में दोषी का आचरण अच्छा रहा है और उसके परिवार में पत्नी, बच्चे और वृद्ध पिता भी है। इसलिए इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर की श्रेणी का मानना असुरक्षित होगा। पीठ ने कहा, आरोपी (अपराध के समय 35 वर्ष) ने वास्तव में सात साल की बच्ची को लीची का लालच दिया था। इसके बाद उसने न सिर्फ बच्ची के साथ दुष्कर्म किया बल्कि उसकी हत्या भी कर दी। शव को करीब सवा किलोमीटर तक घसीटकर नदी के किनारे पर फेंक दिया।
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शीर्ष अदालत ने निचली अदालत और हाईकोर्ट द्वारा दोष सिद्धि के आदेश को तो बरकरार रखा लेकिन फांसी की सजा पर असहमति जताई। पीठ ने निचली अदालत और हाईकोर्ट से मौत की सजा को अनुमानित निष्कर्षों पर आधारित माना। उनका मानना था कि भयानक अपराध और इसकी घृणित प्रकृति के कारण मौत की सजा दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मृत्युदंड देने के लिए बचन सिंह मामले में दिए फैसले में निर्धारित परीक्षणों और मानदंडों पर नीचे की अदालतों द्वारा ठीक से विचार नहीं किया गया।