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SC: 'हाईकोर्ट सजा निलंबित करने से पहले विचार करे'; यौन उत्पीड़न के दोषी की जमानत को लेकर 'सुप्रीम' निर्देश

Thu, 07 Aug 2025 04:46 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ एक नाबालिग लड़की के पिता की याचिका स्वीकार कर ली जिसमें पॉक्सो अधिनियम के तहत 14 वर्षीय लड़की के यौन उत्पीड़न के दोषी को जमानत दी गई थी। साथ ही उसकी अपील पर निपटारे तक उसकी 20 साल की जेल की सजा को निलंबित कर दिया गया था। 
 
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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को सजा निलंबित करने से संबंधित आवेदन पर सुनवाई करते समय दोषसिद्धि को पलटने की उचित संभावना दर्शाने के लिए रिकॉर्ड पर मौजूद प्रथम दृष्टया स्पष्ट साक्ष्यों को परखना चाहिए।

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जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने जमानत को दरकिनार करने और जमानत रद्द करने के बीच के अंतर पर भी प्रकाश डाला। पीठ ने कहा कि जमानत रद्द करना जमानत की शर्तों के उल्लंघन जैसी कुछ परिस्थितियों के कारण होता है, लेकिन जमानत को दरकिनार करना शर्त के उल्लंघन से नहीं, बल्कि जमानत देने वाले आदेश के औचित्य और वैधता से संबंधित है।

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शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ एक नाबालिग लड़की के पिता की याचिका स्वीकार कर ली जिसमें पॉक्सो अधिनियम के तहत 14 वर्षीय लड़की के यौन उत्पीड़न के दोषी को जमानत दी गई थी। साथ ही उसकी अपील पर निपटारे तक उसकी 20 साल की जेल की सजा को निलंबित कर दिया गया था। पिता ने बताया कि दोषी ने केवल एक वर्ष और तीन महीने की कैद की सजा काटी थी और उसकी सजा निलंबित कर दी गई। इस मामले में राज्य सरकार ने हलफनामा दायर कर कहा कि दोषी पर 11 मामले दर्ज हैं। इनमें से पांच में उसे बरी कर दिया गया था, लेकिन छह अब भी लंबित हैं। अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा था कि चिकित्सा विशेषज्ञ को शव पर यौन उत्पीड़न का कोई निशान नहीं मिला, न ही कोई एफएसएल और न ही डीएनए रिपोर्ट रिकॉर्ड में उपलब्ध थी।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि घर में शौचालय उपलब्ध होने के बावजूद यह समझना थोड़ा मुश्किल है कि लड़की शौचालय के लिए बाहर जाएगी। चूंकि निकट भविष्य में इस अपील की सुनवाई और निपटारे की कोई संभावना नहीं है, इसलिए अपीलकर्ता के पास दोषसिद्धि और सजा के फैसले को चुनौती देने के लिए मजबूत आधार हैं। इस प्रकार, यह अपील के लंबित रहने तक सजा को निलंबित करने का एक उपयुक्त मामला है।
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दोषी को आत्मसमर्पण करने का दिया निर्देश
हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए पीठ ने कहा, 'एफएसएल और डीएनए रिपोर्ट से स्वतंत्र और मामले की प्रकृति और प्रतिवादी दोषी के पृष्ठभूमि पर विचार करते हुए और दोषसिद्धि के फैसले की सावधानीपूर्वक जांच करने के बाद हमें लगता है कि हाईकोर्ट द्वारा सजा को निलंबित करना उचित नहीं था। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 389 के तहत निलंबन के मामले पर विचार करने के लिए किसी भी प्रासंगिक कारक पर ध्यान नहीं दिया है। कोर्ट ने दोषी को 30 अगस्त, 2025 तक आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

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