जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि के कारण दुनियाभर में जल संसाधनों के उपयोग में वृद्धि हुई है। खेती और शहर अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए तेजी से भूजल की ओर रुख कर रहे हैं। भूजल के पंपिंग के कारण ऊपर की जमीन की सतह धंस सकती है, क्योंकि नीचे के जलभृत सूख जाते हैं और जमीन की वास्तुकला ढह जाती है।
पहली बार एक नए अध्ययन में दुनिया भर में भू-जल भंडारण क्षमता के इस नुकसान का पता लगाया गया है। बिजली पर सब्सिडी और पानी की अधिकता वाली फसलों के लिए उच्च एमएसपी भी कमी का प्रमुख कारण है। जल प्रदूषण जैसे कि लैंडफिल, सेप्टिक टैंक रिसाव, भूमिगत गैस टैंक और उर्वरकों तथा कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से प्रदूषण के कारण भूजल संसाधनों की क्षति और कमी होती है।
नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में डीआरआई, कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी और मिसौरी यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि कैसे भूजल निकाले जाने से भू-धंसाव और जलभृत के पतन में बढ़ोतरी हो रही है। भूजल की कमी आमतौर पर जमीन से पानी के लगातार पंपिंग के कारण होती है। हम जलभृतों से लगातार भूजल पंप करते रहते हैं और इसके पास खुद को फिर से भरने के लिए पर्याप्त समय नहीं होता है। कृषि आवश्यकताओं के लिए बड़ी मात्रा में भूजल की आवश्यकता होती है।
कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रमुख अध्ययनकर्ता फहीम हसन के अनुसार भू-धंसाव को रोकना संभव नहीं है। इसको रोकने का एकमात्र तरीका भूजल निकासी का उचित प्रबंधन है। आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्र भी चपेट में...अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि शुष्क क्षेत्र ही नहीं बांग्लादेश, भारत और वियतनाम जैसे आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में भी भूस्खलन का खतरंा अधिक है। इन देशों में भारी भूजल दोहन और अंधाधुंध निर्माण प्रमुख वजह है।
कंप्यूटर मॉडलिंग से आंकड़ों की गणना
शोधकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों को कंप्यूटर मॉडलिंग की पूर्वानुमानित क्षमताओं के साथ जोड़कर सटीक अनुमान लगाया कि दुनिया भर में भूजल भंडारण क्षमता लगभग 17 घन किलो मीटर प्रति वर्ष की दर से गायब हो रही है। एक घन मीटर में 1000 लीटर पानी होता है। इस गिरावट का लगभग 75 फीसदी हिस्सा खेती और शहरी क्षेत्रों में हो रहा है। शोध के अनुमानों के अनुसार दुनिया भर में 77 प्रतिशत जमीन धंसने के लिए मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत भूजल दोहन के कारण है।