साल 2020 में ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स के मामले में भारत 0.645 अंक के साथ 131वें स्थान पर था, तो श्रीलंका 0.782 अंक के साथ 72वें स्थान पर था। यानी 189 देशों की सूची में श्रीलंका भारत से बहुत ऊपर था। उसकी प्रति व्यक्ति आय भी भारत से कहीं ज्यादा थी। ऐसे में केवल दो से तीन सालों में ऐसा क्या हुआ कि श्रीलंका तबाही के कगार पर आ गया? जानकार बताते हैं कि श्रीलंका ने अपनी बर्बादी की कहानी स्वयं अपने हाथों से लिखी है और इसके लिए किसी दूसरे को दोष नहीं दिया जा सकता।
कोलंबो में टैक्सटाइल बिजनेस से जुड़े अशोक जैन ने बताया कि पहले श्रीलंका में अलग-अलग मदों में अलग-अलग टैक्स व्यवस्था लागू थी। आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स दर कम होने के साथ-साथ ऊंची आय वालों पर 30 फीसदी तक का टैक्स लगता था, लेकिन लोगों की नजर में बेहतर होने के लिए सरकार ने टैक्स दरें घटाकर आधा कर दीं। केवल 15 फीसदी का टैक्स लेने से सरकार को प्रति वर्ष 60 हजार करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ।
श्रीलंका की अर्थव्यवस्था का लगभग 10 फीसदी अकेले पर्यटन से आता है। कोरोना काल में प्रतिबंधों के कारण दूसरे देशों के पर्यटक श्रीलंका नहीं आ सके। इससे उसे कोई कमाई नहीं हुई और उसे डॉलर में कोई आय नहीं हुई। कोरोना काल में श्रीलंका के जो निवासी बाहर रहकर काम करते थे, और अपने देश को डॉलर भेजते थे, वे भी विदेश नहीं जा सके। जो लोग दूसरे देशों में थे, उनका स्वयं का काम भी बाधित हो चुका था, लिहाजा सरकार के पास डॉलर की कमी होती गई और देश बर्बादी के कगार पर पहुंचता गया।
श्रीलंका की पूरी अर्थव्यवस्था में कर्ज का बड़ा योगदान है। उसने चीन, जापान, भारत और विश्व संस्थाओं से भारी कर्ज ले रखा है। इनकी किस्तें चुकाने के लिए उसे हर साल भारी मात्रा में डॉलर की आवश्यकता होती है। तीन साल पहले श्रीलंका के पास 7.5 अरब डॉलर का रिजर्व था। बीते नवंबर माह में यह भंडार घटकर 1.58 अरब डॉलर रह गया। वर्तमान में देश के पास केवल 17.5 हजार डॉलर ही बचे हैं। अब वह डीजल-पेट्रोल और गैस का मूल्य नहीं चुका पा रहा है, जिसके कारण उसके बिजली प्लांट बंद होने के कगार पर आ गए हैं।