मिजोरम विधानसभा का चुनाव पहली बार इतनी चर्चा में है। इससे पहले कभी भी पूर्वोत्तर का यह छोटा सा राज्य चुनाव के दौरान इतनी चर्चा में नहीं रहा है। इसका कारण है, शायद पहली बार राष्ट्रीय दलों ने यहां पर धुआंधार प्रचार किया है। भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री पहुंचे तो कांग्रेस अध्यक्ष खुद इस बार चुनाव प्रचार करने यहां आए। इसके साथ ही पहली बार आप ने भी अपने प्रत्याशी यहां उतारे हैं। लेकिन इन सबके बीच, इस बार मिजोरम में ही सबसे ज्यादा चर्चा है इस बात की है कि क्या इस बार कांग्रेस या सत्तारूढ़ मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का तिलिस्म टूटेगा। क्या इस बार जोरमथांगा या ललथनहवला के अलावा तीसरा कोई अन्य मुख्यमंत्री पद का दावेदार होगा। क्या इस बार मिजोरम में कोई नया समीकरण बनने जा रहा है। इसका जवाब तो तीन दिसंबर के बाद ही मिलेगा, लेकिन इसके पीछे कई कारण हैं। 1984 से अगर देखें तो मिजोरम में कभी कांग्रेस तो कभी एमएनएफ की सरकारें रहीं। इस बार सवाल है कि क्या एमएनएफ सत्ता बरकरार रख पाएगी या फिर कांग्रेस वापसी करेगी या फिर कोई तीसरा होगा सत्ता का दावेदार।
उल्लेखनीय है कि 1972 में मिजो यूनियन के चुंगा पहले मुख्यमंत्री थे। वर्तमान में एमएनएफ के मुख्यमंत्री ज़ोरमथांगा ने 2018 में शपथ ली थी। कांग्रेस के ललथनहवला 5 कार्यकालों में 21 वर्षों से ज्यादा सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं। मिज़ोरम दो वर्षों के अल्प समय के लिए राष्ट्रपति शासन के अधीन रहा है। दो बार एमपीसी के थेनफुंगा सेलो ने राज्य का नेतृत्व किया।
पहले असम का एक जिला था मिजोरम
1972 से पहले मिजोरम असम का एक जिला था, जिसे मिजो जिला कहा जाता है। 1972 में इसे केंद्र शासित राज्य बनाया गया। 1986 में मिजो भारत सरकार और मिजो नेशनल फ्रंट के बीच पीस ऑकोर्ड के तहत 1987 में यह पूर्ण राज्य बना।
कांग्रेस के ललथनहवला सबसे अधिक समय तक रहे मुख्यमंत्री
राज्य में सबसे अधिक समय तक कांग्रेस ने राज किया। उसके ललथनहवला के पास मिजोरम के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड है। वे पांच बार 1984 से 1986, 1989 से 1993, 1993 से 1998, 2008 से 2013 और 2013 से 2018 तक मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने 1973 से 2021 तक मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनके चुनावी निर्वाचन क्षेत्र सेरछिप और ह्रांगतुर्जो थे जहां से 1978 के बाद वे नौ बार सफलतापूर्वक जीते। 2018 में कांग्रेस बुरी तरह से हार गई। इस बार भी कांग्रेस की राह बहुत आसान नहीं दिखाई दे रही है।
लालडेंगा के बाद जोरमथांगा ने संभाला मोर्चा
1986 में पहली बार मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। इसके बाद एमएनएफ के जोरमथांगा 1998 से 2008 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद 2018 में एक बार फिर एमएनएफ ने वापसी की और अब तक जोरमथांगा प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। इस बार प्रदेश में चुनाव का माहौल काफी बदला हुआ है।
टक्कर एमएनएफ और जेडपीएम के बीच
राजनीतिक जानकार पूर्ण कहते हैं, इस बार टक्कर एमएनएफ और जेडपीएम के बीच है। जेडपीएम नई पार्टी है और उसके वादे युवाओं को पसंद आ रहे हैं। लेकिन गांवों में एमएनएफ का बर्चस्व है। भाजपा ने पहली बार मिजोरम पर फोकस किया है, जिसका असर थोड़ा देखने को मिल सकता है।