चांदीपुरा वायरस (CHPV), रैबडोविरिडे फैमिली का सदस्य है, ग्रामीण क्षेत्रों में इसके कारण संक्रमण होने का खतरा अधिक देखा जाता है। यह ज्यादातर बच्चों को प्रभावित करता है और शुरुआत में इन्फ्लूएंजा जैसे लक्षण उत्पन्न करता है। मच्छरों, टिक्स और कुछ प्रकार की मक्खियों के काटने से इसका संक्रमण फैलता है।
गुजरात में लगातार सामने आ रहे चांदीपुरा के मामलों से निपटने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने बड़ी पहल की है। मंत्रालय ने जांच, पर्यावरण, महामारी के अध्ययन और रोकथाम के लिए विशेष टीम बनाई है। जो गुजरात सरकार की मदद करेगी। वहीं स्वास्थ्य मंत्रालय ने चांदीपुरा वायरस और एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम की समीक्षा के बाद माना है कि संक्रमण के मामले देश के सिर्फ छोटे से हिस्से में हैं।
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स्वास्थ्य मंत्रालय के डीजीएचएस और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के निदेशक डॉ. अतुल गोयल ने शुक्रवार को गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में चांदीपुरा वायरस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के मामलों की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने गुजरात में रिपोर्ट किए गए एईएस मामलों के व्यापक महामारी विज्ञान, पर्यावरणीय और कीट विज्ञान संबंधी अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गुजरात की सहायता के लिए एनसीडीसी, आईसीएमआर और डीएएचडी की एक केंद्रीय टीम तैनात की जा रही है। बैठक में कलावती सरन बाल चिकित्सालय और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निमहंस) के विशेषज्ञों के साथ-साथ केंद्रीय और राज्य निगरानी इकाइयों के अधिकारी शामिल हुए।
चांदीपुरा वायरस का संक्रमण
चांदीपुरा वायरस (CHPV), रैबडोविरिडे फैमिली का सदस्य है, ग्रामीण क्षेत्रों में इसके कारण संक्रमण होने का खतरा अधिक देखा जाता है। यह ज्यादातर बच्चों को प्रभावित करता है और शुरुआत में इन्फ्लूएंजा जैसे लक्षण उत्पन्न करता है। मच्छरों, टिक्स और कुछ प्रकार की मक्खियों के काटने से इसका संक्रमण फैलता है। संक्रमण की गंभीर स्थिति में अक्यूट इंसेफेलाइटिस (मस्तिष्क में सूजन) हो सकती है। समय पर उपचार न मिल पाने के कारण रोगी की मौत होने का भी खतरा देखा जाता रहा है।
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घातक है ये संक्रामक रोग
चांदीपुरा वायरल संक्रमण के मामले वैसे तो काफी दुर्लभ हैं लेकिन इसके कारण घातक स्थितियां उत्पन्न होने का खतरा रहता है। बुखार, फ्लू जैसे लक्षणों के साथ शुरू होने वाला ये संक्रमण बच्चों में इंसेफेलाइटिस का कारण बन सकता है। गंभीर स्थितियों में इसके कारण कोमा और यहां तक कि मृत्यु का भी जोखिम रहता है। इस संक्रमण के कारण मृत्यु दर 56 से 75 प्रतिशत तक देखी जाती रही है।
संक्रमण का इलाज और बचाव
चांदीपुरा वायरस का संक्रमण चूंकि काफी दुर्लभ है इसलिए अभी तक इसका कोई उचित इलाज नहीं है। हालांकि संक्रमण का समय पर पता लगने और सहायक उपचार शुरू हो जाने से इसके गंभीर रूप लेने और मस्तिष्क से संबंधित विकारों के खतरे को कम किया जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चों को इस संक्रामक रोग से सुरक्षित रखने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। प्रभावित क्षेत्रों में खेतों या झाड़ियों में जाने से बचें। मच्छरों, टिक्स और मक्खियों से बचाव करें। संक्रमण के लक्षणों के बारे में जानना और समय रहते इलाज प्राप्त करना सबसे आवश्यक हो जाता है।