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गौरैया के लिए फिर से आंगन में थोड़ी सी जगह बनानी होगी

Sun, 01 May 2016 07:14 PM IST
रिज़वान/अमर उजाला, दिल्ली
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ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है
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कहीं भी शाखे-गुल देखे तो झूला डाल देती है।

मुनव्वर राना की गजल का ये शेर अब झूठा सा लगता है। चिड़िया अब कहीं भी शाख को देखकर झूला नहीं डालती, अपना आशियाना नहीं बनाती। कहां से बनाएगी? हैं कहां है चिड़िया? अब सुबह पंछियों के चहचहाने से नींद नहीं खुलती अब तो पंछियों के देखने के लिए देर तक आसमान तकना पड़ता है।

कभी हर मुंडेर और आंगन में दाना दिखते ही आ जाने वाली गौरेया अब नहीं दिखती। परिवार के सदस्य जैसी रहने वाली गौरेया आज खत्म हो जाने की कगार पर है। गौरैयाओं की लगातार घटती संख्या को देखते हुए इनको बचाने की एक मुहिम के तहत गौरैयाओं के लिए भी एक दिन बनाया गया। 2010 में 20 मार्च को 'वर्ल्ड स्पैरो डे' घोषित किया गया। हर साल एक दिन से लिए एक दिन कुछ बातें की जाती हैं लेकिन गौरैया घटती ही जा रही है। लगता है जैसे गौरैया भी कुछ दिन बाद सिर्फ कहानियों में होगी।
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गौरैया दिवस के मौके पर अमर उजाला ने जाने-माने लेखक नवनीत मिश्रा से बातचीत की तो उन्होंने गौरैया से अपने लगाव पर कई बातें बताईं। नवनीत मिश्रा के शब्दों में।

'विचार पक्षियों की तरह आते हैं और आकर चले जाते हैं। जिस विचार को ठहरना होता है वो घोंसला बनाके मन के कोने में ठहर जाते हैं और किसी अवसर पर वो अचानक सामने आकर खड़े हो जाते हैं और कहते हैं लो मुझे इस्तेमाल करो। बहुत दिन से गौरेया को देखा नहीं था, ये विचार मन में आया कि बहुत दिन हो गए गौरेया को देखा नहीं।'

घर के बड़े-बूढ़े की तरह घर में गौरेया जरूरी है

नवनीत मिश्रा की पत्नी का बनाया गौरेया का घोसला - फोटो : नवनीत मिश्रा
नवनीत बताते हैं, 'पिछले दिनों पत्नी ने एक डिब्बे को काटकर उसका घौंसले जैसा बनाके दरवाजे पर टांग दिया, इस उम्मीद में कि शायद गौरैया आए और गौरेया आई भी। उसने चार अंडे दिए और फिर चार बच्चे भी निकले।'

अपने पुराने दिनों को नवनीत याद करते हैं 'जब मैं चार-पांच बरस का था तो मां फर्श पर झाड़ू बुहेरती रहती थी, गौरैया बोलती रहती थी और रेडियो पर गाना बजता रहता था 'चुपके-चुपके बोल मैना साजन कब घर आएंगे, ये मेरी एक खूबसूरत याद है।'

'जब पत्नी ने गौरैया को बुलाया तो रोशनदान में शीशा लगा था जिसमें देखकर गौरेया अपनी चोंच उस पर मारती थी। इस डर से कि ये खुद को जख्मी ना कर ले उस शीशे पर कागज लगा दिए गए वो घायल ना होती दरअसल वो चोंच मारके कुछ कहना चाहती थी'

नवनीत कहते हैं 'दरअसल गौरैया घर की किसी बड़ी बूढ़ी की तरह होती है जो सुबह सूरज निकलने से पहले आपसे कहती कि अब तक सोए हुए हो, उठ जाओ। जिस तरह घर में बड़ों का होना जरूरी है, इसी तरह गौरैया भी जरूरी है'

आज के दौर में कहां टिक पाएंगे नाजुक पंछी

- फोटो : गेटी
नवनीत कहते हैं कि 'पशु-पक्षियों के नाम पर हमारे करीब सिर्फ कुत्ता रह गया है, उसी को हम पालते हैं। वो भी अपने स्वार्थ के लिए कि कोई नया आदमी घर में आएगा तो ये भौंकेगा। दूसरे पशु-पक्षियों से हम बहुत दूर हो गए हैं'

नवनीत मिश्रा कहते हैं 'आज का जो माहौल है, उसके लिहाज से किसी पक्षी का मिजाज नाजुक होता है। मिश्रा कहते हैं 'ये टावर, धूल, धुआं और इतना प्रदूषण होते हुए पंछी भला कहां रह पाएंगे'

'आज का समय ऐसा है कि समय ने हमें क्रूर बना दिया है। आजकल तो साफ है कि अगर आप प्रयारण के बहुत हिमायती हैं तो जाकर जंगल में रहिए जैसे कई सौ साल पहले आदमी रहता था।'
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गौरेया के लिए, बहुत देर कर दी हमने हुजूर आते-आते

- फोटो : गेटी
नवनीत मिश्रा से सवाल किया गया कि आखिर पिछले छह साल से 'गौरैया दिवस' मनाया जा रहा है, इसका इस मासूम पंछी को कितना फायदा हुआ है? नवनीत कहते हैं 'हमने कोशिश तो की पर बहुत देर से की। हमको बहुत पहले कोशिश करनी चाहिए थी, अब गौरेया विलुप्त प्राय: हो चुकी हैं।'

नवनीत कहते हैं 'फिर भी हम समझते हैं कि कोशिशों का कुछ फायदा होगा। दुनियाभर में एक दिन गौरैया के नाम पर होने से कम से कम कुछ देर के लिए और रस्मी तौर पर ही सही लोग गौरैया को याद तो करने लगे। शायद इस रस्मी दिन के बहाने कुछ और दिन हम कभी-कभी गौरैया को याद कर लेते हैं।'


नवनीत कहते हैं 'पहले जब हम आंगन में बैठ के खाना खाते थे तो गौरैया बेहद पास आ जाती थी। वो इतनी पास होती थी कि हमारे साथ ही खाना खाती थी। अब पक्षी भी हमसे डरने लगे हैं। जरूरी है कि हम फिर से पंछियों के करीब आएं उन्हें अपने दोस्त बनाएं। इन छोटी-छोटी चिड़ियों के लिए कुछ शाखें बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच भी छोड़नी होगीं।'
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