बोल, कि लब आजाद हैं तेरे
बोल, जबां अब तक है तेरी।
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल, कि जां अब तक तेरी है।
अपनी हर नज्म से सोते हुए जमीरों को जगा देने वाले, इंकलाबी शायरी में उर्दू दुनिया के सबसे बड़े नामों में एक फैज अहमद फैज की आज 105वीं जयंती है। एक ऐसा शायर जिसका एक-एक शेर दबे-कुचलों की आवाज कई सालों से बना हुआ है। फैज ने अपनी गजलों और नज्मों के जरिए हमेशा हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और तमाम उर्दू बोलने वालों के दिलों में अपनी अलग जगह बनाई है।
आमतौर पर किसी शायर को उसकी शायरी के लिए याद किया जाता है, लेकिन फैज शायरी और शख्सियत दोनों ही वजहों से लाखों लोगों के दिल में रहते हैं। फैज की शायरी हमेशा हमारी जिंदगी के मसाइल को हमारे सामने रखती है, हमारे सोये हुए जहनों को झंझोड़ देती है। गाह-बगाहे फैज किसी शेर किसी मिसरे के जरिए हमारे साथ आ खड़े होते हैं। फैज ने ऐसे जिंदगी की हकीकतों को गजलों और नज्मों में पिरोया है, कि वो याद आ ही जाते हैं।
भले ही आज आजादी को सात दशक के ज्यादा वक्त हो गया है लेकिन ये सच है कि आज भी फौज का ये शेर उतना ही नया लगता है जितना इस मुल्क से अंग्रेजों के जाने के कुछ सालों बाद लगता था। जिस खुशनुमा सुबह का इंतजार मुल्क के बाशिंदों को आजादी के बाद बरसों से है, वो नहीं आती दिखती तो फैज याद आते हैं। फैज कहते हैं
ये दाग-दाग उजाला, ये शब-गजीदा सहर
वो इंतजार था जिसका, ये वो सुबह तो नहीं।
फैज की शायरी के मशहूर होने की वजह है उनकी शायरी में जिंदगी की कशमकश, नाइंसाफी के खिलाफ विद्रोह, एक क्रान्ति, एक आग। फैज के शेर यूं तो हर भूख से मरते इंसान की मौत के बाद याद आते हैं, हर किसान की खुदकुशी के बाद याद आते हैं। लेकिन फैज पिछले कुछ दिनों से कुछ ज्यादा ही याद आ रहे हैं।
जब जुबान खोलते ही गद्दार हो जाने का डर हो, जब हर किसी को देशभक्ति को आस्तीन पर चढ़ा के रखना हो, जब देश में शिक्षक दिवस पर ऐलान हो जाए 'अपने बच्चों से कहो, मेरे मुताबिक सोचें', जब एक खास सोच से अलग आप सोचें तो आपको मुल्क के बदनुमा दाग की तरह दिखाया जाए, जब क्या खाया के सवाल पर किसी को कत्ल कर दिया जाए तो फिर फैज याद आते हैं और बेइंतिहा याद आते हैं। शायद ये सारी वजहें ही हैं कि आज फैज खबरिया चैनलों पर भी खूब याद किए जाने लगे हैं।
हर रग-ए-खूं में फिर चरागा हो
सामने फिर वो बेनकाब आए
कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए।
एक पत्रकार, शायर, फौजी, अनुवादक और आधा दर्जन से ज्यादा भाषाएं जानने वाले फैज 13 फरवरी 1911 पंजाब के नारनौल कस्बे में पैदा हुए। फैज अहमद को दुनियाभर में फैज अहमद 'फैज' के नाम से पहचान मिली। फैज जिस कस्बे में पैदा हुए वो भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान के हिस्से में आया। फैज भले ही पाकिस्तान के बाशिंदे हो गए लेकिन उनकी नज्में और गजलें हमेशा ही सरहदों के बहुत दूर तर पसंद की जाती रहीं। उनकी नज्मों में जो विद्रोह है, जो बंदिशों को तोड़ने की चाह है, सिस्टम पर जो तंज है वो भले ही सत्ता में बैठे कुछ 'खास' लोगों को मुतास्सिर ना करे, उन्हें पसंद ना आए लेकिन आम लोगों को जरूर अपनी लगती है।
निसार मैं तेरी गलियों पे ए वतन के जहां
चली है रस्म कि कोई ना सर उठाके चले।
जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले
नजर चुरा के चले, जिस्मों-जां बचाके चले।
एक बैरिस्टर के घर पैदा हुए फैज अहमद का 'फैज' बनना भी किसी कहानी जैसा है। जिसने घर में कभी गरीबी नहीं देखी, हर तरफ एशो-आराम देखी। उस शायर ने क्यों पूंजीवाद की मुखालफत में क्यों अपनी जिंदगी के अहम साल जेलों में गुजार दिए, क्यों वो शायर वतन से निकाला गया। दरअसल फैज अहमद के इंकलाबी फैज बनने की शुरुआत अमृतसर में हुई।