फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मुलायम-कांशीराम के दौर में लौटी सपा-बसपा, भाजपा को हराएगी

Sat, 12 Jan 2019 03:13 PM IST
Avdhesh Kumar शशिधर पाठक, नई दिल्ली
विज्ञापन
मुलायम और कांशीराम - फोटो : amar ujala
विज्ञापन

मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्री राम। यह नारा 90 के दशक में लगा था। तब सपा और बसपा गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। उसी दौर में लौटते हुए अखिलेश और मायावती ने लोकसभा चुनाव के लिए पहली बार साथ आकर इस बार भजापा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कड़ी चुनौती दे दी है। कांग्रेस को गठबंधन के दायरे से रखते हुए मयावती और अखिलेश ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 38-38 पर लडने का संकल्प लेकर भाजपा को हराने की प्रतिबद्धता जताई है। बसपा प्रमुख ने कांग्रेस और बसपा को समान रूप से भ्रष्ट पार्टी बताया है। खास बात यह है कि घोषणा प्रधानमंत्री मोदी के भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में अपना भाषण देने बस कुछ ही समय पहले हुई है।

विज्ञापन


कड़ी है चुनौती

बुआ-बबुआ (मायावती-अखिलेश) की यह चुनौती काफी कड़ी मानी जा रही है। गठबंधन की इस संभावना को लेकर भाजपा के खेमे में काफी परेशानी महसूस की जा रही है। भाजपा के उत्तर प्रदेश सरकार में परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह का मानना है कि बसपा-सपा का गठबंधन चुनौती बनेगा। स्वतंत्र देव सिंह का कहना है कि यदि इस गठबंधन में कांग्रेस शामिल हो जाती तो लड़ाई काफी आसान रहती। 

उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री का तर्क है कि तब मुस्लिम वोटों में बंटवारा नहीं होता। इससे भाजपा को काफी फायदा होता। अगड़ी जाति के वोटों में बंटवारा नहीं होता। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 की तरह संदेश जाता और भाजपा आसानी से अपने लक्ष्य को पा लेती। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का भी आकलन है कि सपा-बसपा के साथ रहने और कांग्रेस के अलग रहने पर भाजपा की मुश्किल तुलना में काफी बढ़ जाएगी।
विज्ञापन


वोट पर कौन भारी

2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को उत्तर प्रदेश में 19.60 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन एक भी सीट नहीं मिली। सपा 22.20 प्रतिशत वोट पाई लेकिन पांच सीटें ही जीत सकी। सपा-बसपा का यह जोड़ 41.80 प्रतिशत वोट तक पहुंचता है। जबकि भाजपा, अपना दल मिलकर 42.30 प्रतिशत वोट लाए थे। बसपा राज्य में विधानसभा चुनाव में हुए मतदान के आधार पर दावा करती है कि उसके पास 21 प्रतिशत के करीब वोट हैं। 

सपा के नेता इसे अब 26 प्रतिशत तक बताते हैं। दोनों का दावा है कि भाजपा को अबतक सबसे अधिक वोट 2014 के लोकसभा चुनाव में ही मिला है। उनका वोट प्रतिशत भाजपा से अधिक है। इस तरह से 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन 60 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर सकता है। भाजपा के नेता भी गठबंधन की घोषणा होने के बाद मान रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में लड़ाई आसान नहीं है।

विज्ञापन

क्या है मैकेनिक्स

सपा और बसपा ने 38-38 सीटें अपने लिए, दो सीट सहयोगियों के लिए और दो सीट(अमेठी, रायबरेली) पर चुनाव न लडऩे का फैसला किया है। सहयोगियों में कौन होगा, इसे बसपा प्रमुख मायावती ने साफ नहीं किया है। लेकिन माना जा रहा है कि जनवरी के अंत तक इस गठबंधन में एक सहयोगी और शामिल हो सकता है। राष्ट्रीय लोकदल के बारे में पूछे जाने पर दोनों दलों की तरफ से इसे बाद में देखने की बात कही गई है। हालांकि दो दिन पहले ही राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी अखिलेश यादव से मिलकर लौटें हैं। अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि जयंत से अखिलेश की क्या बात हुई है। इस बारे में अभी चौधरी अजीत सिंह से कोई संपर्क नहीं हो सका है। फिलहाल अखिलेश यादव ने इस गठबंधन का उद्देश्य  भाजपा को सत्ता में आने से रोकने बताया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी सपा-बसपा के गठबंधन का स्वागत किया है। जबकि केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली ने इसे दो स्वाभाविक दुश्मनों का गठबंधन करार दिया है।

क्या बढ़ेगी भाजपा की मुश्किल?

सवाल पेंचीदा है। अभी गठबंधन और लोकसभा चुनाव को लेकर जनता का मूड साफ नहीं है। लेकिन माना जा रहा है कि भाजपा को वोटों के ध्रुवीकरण में मुश्किल आएगी। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद के दावेदारों में शामिल एक नेता का कहना है कि यदि सपा-बसपा-रालोद-कांग्रेस साथ आ जाते तो भाजपा वोटों का ध्रुवीकरण कराने में आसानी से सफल हो जाती। क्योंकि राज्य का अल्पसंख्यक मतदाता केवल एक ही तरफ गठबंधन करता। इसका गलत संदेश जाता।

समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के करीबी रहे पूर्व एमएलसी भी इससे सहमत हैं। सूत्र का मानना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा के साथ आने पर यही संदेश गया था। भाजपा के नेता भी दबी जुबान से मानते हैं कि कांग्रेस का प्रदेश में 10 प्रतिशत तक वोट रहता है। कांग्रेस के अलग चुनाव लडऩे पर अगड़ी जाति के वोटों में कुछ सेंध लग सकती है। इसके अलावा अल्पसंख्यक वोटों में भी बंटवारा होगा। वहीं भाजपा भी 2017 और 2014 की भाजपा नहीं रह गई है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें