पांच से दस मिनट के भीतर मोटर साइकिल सवार आए और पिस्तौल से पहले सुरक्षा गार्डों को मारा। फिर एके-47 की गोलियों से बुखारी को छलनी कर दिया। सूत्रों का कहना है कि यह पाकिस्तानी आकाओं के इशारों पर चलने वाले घाटी में रह रहे लश्कर-ए-तैयबा के गुर्गों का काम है। लश्कर के ऐसे लोग घाटी में भारत की हिमायत करने वाले नामचीन लोगों को अपना निशाना बनाते हैं।
सूत्रों के मुताबिक केंद्र रमजान के दौरान सीजफायर की अवधि बढा कर अलगाववादियों को बातचीत के टेबल पर लाने की गंभीर कोशिश में जुटा था। अब बुखारी की हत्या के बाद यह संभावना बिल्कुल ही खत्म होती दिख रही है। अब अलगाववादियों के बातचीत में यकीन रखने वाला धड़ा भी चुप्पी लगाकर बैठ जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक इससे पहले घाटी में मौजूद पाकिस्तान के गुर्गों ने अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन की हत्या भी इसी वजह से की थी। 90 के दशक की शुरुआत में लोग शुजात बुखारी की ही तरह कश्मीर का भविष्य भारत के साथ होने की तरफदारी करने लगे थे। सूत्रों के मुताबिक उस घटना के बाद मौत के डर से अलगाववादी लगातार पाकिस्तान की भाषा बोलते हैं।