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सुप्रीम कोर्ट: मैंने अदालत को पूरा जीवन दिया, लेकिन धीरे-धीरे कम हो रहा है संस्था पर विश्वास, बोले कपिल सिब्बल

Tue, 13 Sep 2022 09:25 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कपिल सिब्बल ने यह टिप्पणी अब्दुल्ला आजम खां की अपील पर सुनवाई के दौरान कही। इस पर मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस नागरत्ना ने कहा, "जीतने वाले पक्ष जो महसूस करता है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हारने वाला पक्ष क्या महसूस करता है, हारने वाले पक्ष को भी संतुष्ट होकर वापस जाना चाहिए।"
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कपिल सिब्बल
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विस्तार
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सपा नेता आजम खां के बेटे अब्दुल्ला आजम खां की अपील पर मंगलवार को बहस बहस के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ के समक्ष कहा कि संस्था पर विश्वास धीरे-धीरे कम हो रहा है। सिबाल ने कहा कि यदि वादी को लगता है कि उसकी सुनवाई की गई है और कानून को सही तरीके से लागू किया गया है तो विश्वास बना रहेगा, भले ही निर्णय उसके खिलाफ ही क्यों न हो।
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सिब्बल ने जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ से कहा, ' जिस कुर्सी पर आप बैठते हैं, उसके लिए हमारे मन में बहुत सम्मान है। यह एक ऐसी 'शादी' है जिसे बार और बेंच के बीच नहीं तोड़ा जा सकता है। यहां कोई अलगाव नहीं है। जब हमें पता चलता है कि इस छोर पर क्या हो रहा है और दूसरे छोर पर क्या हो रहा है तो यह मेरे जैसे व्यक्ति को परेशान करता है, जिसने इस अदालत को पूरा जीवन दिया है।' 

इस पर जस्टिस रस्तोगी ने जवाब दिया, ' हम हमेशा कहते हैं कि बार और बेंच रथ का पहिया हैं, लेकिन जमीनी हकीकत है कि ये दो पहिये हैं। भगवान जाने एक पहिया कहां जाता है और दूसरा पहिया कहां जाएगा जबकि रथ कहीं रहता है। लेकिन फिर भी हमें समझना होगा कि हम सभी इस संस्था से संबंधित हैं और इस संस्था ने हमें दिया है। हमारा मानना है कि बार और हमें भी आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है कि कैसे होगा हम टिके रह सकते हैं... ऐसे राष्ट्र में कैसे टिके रहें जहां आम लोगों का विश्वास नहीं मिटता। विश्वास बहाल होना चाहिए। सिब्बल ने जवाब दिया कि अगर बार और बेंच, दोनों खेल के नियमों का पालन करेंगे तो स्थिति में विश्वास कायम रहेगा। 
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सिब्बल ने कहा, 'यह केवल एक तरह से हो सकता है कि हम इस छोर पर खेल के नियमों का पालन करें और दूसरे छोर पर भी ऐसा ही हो। विश्वास बहाल करने का यही एकमात्र तरीका है, कोई दूसरा रास्ता नहीं है। अगर मैं अदालत में आता हूं और मुझे विश्वास है कि चाहे कुछ भी हो, चाहे निर्णय मेरे खिलाफ ही क्यों न हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे सुना गया और दूसरे के द्वारा कानून बिना किसी डर और पक्षपात के सही तरीके से लागू किया गया। अगर ये चीजें होती हैं तो विश्वास बहाल हो जाएगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम हारते हैं या जीतते हैं। हमें अक्सर पता होता है कि मामले पर क्या होना है, हम मुवक्किलों को भी यह साफगोई से बता देते है। रोजाना हमें कुछ मामलों में हार का सामना करना पड़ता है तो कुछ मामलों में जीत। महत्वपूर्ण यह है कि संस्था में हमारा विश्वास है, जो धीरे-धीरे कम हो रहा है।'

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'जीतने वाले पक्ष जो महसूस करता है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हारने वाला पक्ष क्या महसूस करता है। हारने वाले पक्ष को भी संतुष्ट होकर वापस जाना चाहिए।' सिब्बल अब्दुल्ला आजम खां की ओर से दलीलें पेश कर रहे थे। 2017 में स्वार निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव रद्द किए जाने को अब्दुल्ला ने चुनौती दी है।

मालूम हो कि हाल ही में सिब्बल ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची है। जाकिया जाफरी और पीएमएलए मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की आलोचना करते हुए सिब्बल ने ये टिप्पणी की थी। इस बयान के बाद एक वकील ने  सिब्बल के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही के लिए अटॉर्नी जनरल से सहमति मांगी थी लेकिन अटॉर्नी जनरल ने सहमति देने से इनकार कर दिया था।
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