सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 29 जनवरी की अधिसूचना को सही ठहराया, लेकिन उसमें शामिल उस विवादित प्रावधान को खारिज कर दिया, जिसमें कुछ बड़े भवन निर्माण परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी से छूट दी गई थी। चीफ जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि 20,000 वर्ग मीटर से अधिक निर्माण क्षेत्र वाली किसी भी परियोजना कोपर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) 2006 के नियमों से छूट नहीं दी जा सकती, चाहे वह औद्योगिक हो, शैक्षणिक हो या कोई और। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिसूचना केरल राज्य पर भी लागू होगी।
सीजेआई ने फैसला सुनाते हुए कहा, हमेशा यह माना गया है कि प्राकृतिक संसाधनों को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। साथ ही, अदालतें विकास कार्यों को भी महत्व देती रही हैं, क्योंकि देश विकास के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा सतत विकास पर जोर दिया है। उन्होंने कहा, अदालत यह सुनिश्चित करती रही है कि विकास हो, लेकिन इसके साथ-साथ पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो, इसके लिए जरूरी सावधानियां भी बरती जाएं। कई बार ऐसे विकास कार्यों पर जुर्माना भी लगाया गया है।
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शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि देशभर की परियोजनाओं की जांच करना केंद्र सरकार के लिए संभव नहीं है, इसलिए इस मुद्दे को राज्य स्तर पर देखा जा सकता है। कोर्ट ने कहा, अगर 20,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में कोई निर्माण कार्य होता है, तो उसका पर्यावरण पर असर होगा, चाहे वह औद्योगिक हो या शैक्षणिक। ऐसे में एक जैसे संस्थानों में भेदभाव नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षा क्षेत्र को इस मामले में छूट नहीं दी जा सकती।
सीजेआई ने कहा, आजकल शिक्षा भी एक फलता-फूलता उद्योग बन गई है, इसलिए ऐसी परियोजनाओं को 2006 की अधिसूचना से बाहर रखने का कोई कारण नहीं है। बेंच ने 29 जनवरी की अधिसूचना के नियम 8 को छोड़कर बाकी अधिसूचना को सही माना। नियम 8 में औद्योगिक शेड, स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों को 1,50,000 वर्ग मीटर तक के निर्माण क्षेत्र के लिए पर्यावरणीय मंजूरी से छूट दी गई थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।
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कोर्ट ने यह भी माना कि पर्यावरण मंत्रालय के लिए देशभर की सभी परियोजनाओं का मूल्यांकन करना व्यावहारिक नहीं है। ऐसे में केंद्रीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति राज्यवार मूल्यांकन कर सकती है। गौरतलब है कि 25 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिसूचना पर रोक लगा दी थी। यह रोक मुंबई स्थित एनजीओ ‘वनाशक्ति’ की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर लगाई गई थी। एनजीओ ने तर्क दिया था कि यह छूट ईआईए की सुरक्षा व्यवस्थाओं को कमजोर कर देती है और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को खतरे में डालती है।