उच्चतम न्यायालय ने अखिल भारतीय बार परीक्षा नियम, 2010 को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को केन्द्र और बार काउंसिल आफ इंडिया (बीसीआई) को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने आदेश में कहा कि यह अनिवार्य है कि एक वकील को नामांकन के बाद कानून का अभ्यास करने के लिए ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन में उत्तीर्ण होना होगा।
न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने इन नियमों को निरस्त करने के लिए ठाणे निवासी पार्थसारथी महेश सराफ की याचिका पर नोटिस जारी किया। पीठ ने इन नियमों पर रोक लगाने के आवेदन पर भी नोटिस जारी किए हैं और मामले को तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध किया है।
इस याचिका में कहा गया है कि बार काउंसिल आफ इंडिया द्वारा 2010 में बनाए गए इन नियमों से अधिवक्ता कानून का उल्लंघन होता है। याचिका में इन नियमों को मनमाना और गैरकानूनी बताते हुए कहा गया है कि बतौर अधिवक्ता पंजीकरण कराए जाने के बाद भी एक वकील को इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए बाध्य किया जाता है।
याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत में इस मामले का फैसला होने तक बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा 24 जनवरी और 21 मार्च को आयोजित की जा रही परीक्षाओं पर अंतरिम रोक लगाने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया है।
वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वीके बीजू ने पीठ से कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया बगैर किसी कानूनी प्रावधान के ही इस साल परीक्षा करा रही है।
इस तरह की परीक्षा की किसी अनिवार्यता के बारे में बीसीआई के अधिकार पर सवाल उठाते हुए याचिका में अनुरोध किया गया है कि याचिकाकर्ता को पहले से ही बतौर अधिवक्ता पंजीकृत होने के आधार पर वकालत करने की अनुमति प्रदान की जाए। याचिका में इस साल की परीक्षा के लिए बीसीआई की प्रेस विज्ञप्ति निरस्त करने का भी अनुरोध किया गया है।