सुप्रीम कोर्ट की पीठ इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली महायान थेरवाद वज्रयान बौद्ध धार्मिक और धर्मार्थ ट्रस्ट की अपील पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने आदेश में कहा था कि केवल अल्पसंख्यकों की ओर से चलाए जाने मात्र से संस्थान को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट इस बात की जांच के लिए सहमत हो गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों की ओर से संचालित शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया जाना चाहिए या नहीं। शीर्ष अदालत ने इस मामले में यूपी सरकार, अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों के राष्ट्रीय आयोग, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग व अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
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जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली महायान थेरवाद वज्रयान बौद्ध धार्मिक और धर्मार्थ ट्रस्ट की अपील पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने आदेश में कहा था कि केवल अल्पसंख्यकों की ओर से चलाए जाने मात्र से संस्थान को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
यह है मामला
याचिकाकर्ता ट्रस्ट ने 2001 में एक मेडिकल कॉलेज की स्थापना की थी। बाद में ट्रस्ट के सदस्यों ने 2015 में बौद्ध धर्म अपना लिया और संस्थान का प्रशासन भी देखते रहे। यूपी सरकार ने संस्थान को अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में मान्यता देने से मना कर दिया था।
हाईकोर्ट ने आदेश में कहा था, संस्थान को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त करने के लिए न केवल अल्पसंख्यक द्वारा संचालित किया जाना चाहिए, बल्कि स्थापित किया गया होना चाहिए।