पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा राज्य की अधिसूचना के आधार पर इस मामले में न्यूनतम मजदूरी तय की और मृतक की आय का आकलन कर मुआवजे की राशि कम कर दी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एमएसीटी के निष्कर्षों को सही पाया और कहा, ट्रिब्यूनल का दृष्टिकोण कानून के साथ-साथ तथ्यों पर भी काफी उचित है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि मृतक की मासिक आय का मूल्यांकन करना संभव हो तो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम में जाने की जरूरत नहीं है। इस अधिनियम की अधिसूचना सिर्फ उस मामले में एक मार्गदर्शक कारक हो सकती है जहां मृतक की मासिक आय का मूल्यांकन करने के लिए कोई सुराग उपलब्ध नहीं है।
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जस्टिस सूर्यकांत एवं जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने करनाल के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) के फैसले को बहाल कर दिया। पीठ ने कहा, हाईकोर्ट का मृतक की मासिक आय कम करने का कारण पूरी तरह से गुप्त है, जिसका कोई औचित्य नहीं है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा राज्य की अधिसूचना के आधार पर इस मामले में न्यूनतम मजदूरी तय की और मृतक की आय का आकलन कर मुआवजे की राशि कम कर दी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एमएसीटी के निष्कर्षों को सही पाया और कहा, ट्रिब्यूनल का दृष्टिकोण कानून के साथ-साथ तथ्यों पर भी काफी उचित है।
पीठ ने मृतक के आश्रित की अपील को रखा कायम
पीठ ने कहा, ट्रिब्यूनल ने इस मामले में सही दृष्टिकोण अपनाते हुए यह तथ्य रखा कि मृतक की मासिक आय 25,000 से कम नहीं हो सकती, क्योंकि मृतक नियमित रूप से मार्च 2014 से ट्रैक्टर के ऋण के लिए 11,550 रुपये की मासिक किस्त का भुगतान कर रहा था और उसकी मृत्यु के बाद भी भुगतान किए जाने के साथ मार्च 2015 तक पूरी ऋण देयता का निर्वहन किया गया था। इसके बाद पीठ ने मृतक के आश्रित की अपील को कायम रखा और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला खारिज कर दिया और न्यायाधिकरण द्वारा तय मुआवजे को कायम रखा। पीठ ने कहा, अब तक किए गए भुगतान के अलावा मुआवजे में जो भी राशि शेष है वह ब्याज सहित दो महीने में न्यायाधिकरण के पास जमा कराई जाए।