सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें 2013 में दुर्घटनाग्रस्त हुए एक बीमित वाहन के लिए देय बीमा राशि को 5.02 लाख रुपये से घटाकर 53,543 रुपये कर दिया गया था।
मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस पी एस नरसिम्हा और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आयोग ने पॉलिसी की एक शर्त पर भरोसा करते हुए राशि कम कर दी, जिसमें कहा गया था कि किसी दुर्घटना की स्थिति में वाहन को बिना उचित सावधानी के अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
सोप्रीम कोर्ट का तर्क
कोर्ट ने कहा कि इस शर्त की व्याख्या करते वक्त दुर्घटना की परिस्थितियों का ध्यान रखना जरूरी था, ताकि यह तय किया जा सके कि बीमाधारक ने उचित सावधानी बरती थी या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता ने दुर्घटना के बाद सह-यात्री को अस्पताल पहुंचाया, जिसके बाद कार पलट गई और शॉर्ट-सर्किट के कारण वाहन में आग लग गई। बीमा कंपनी ने वाहन की देखभाल न करने का हवाला देते हुए दावे को अस्वीकार कर दिया था।
बता दें कि अपीलकर्ता ने अपने वाहन के लिए एक निजी कार बीमा पॉलिसी खरीदी थी जो 2 जुलाई, 2012 से 1 जुलाई, 2013 तक लागू थी, और बीमा फर्म से दावा की जा सकने वाली अधिकतम राशि 5,02,285 रुपये निर्धारित की गई थी। इसको लेकर पीठ ने कहा कि जब यह पॉलिसी लागू थी, तब अपीलकर्ता 25 मार्च, 2013 को एक दुर्घटना का शिकार हुआ, जब वह गाड़ी चला रहा था और गाड़ी खाई में गिर गई।
हालांकि, बीमा कंपनी ने एनसीडीआरसी का रुख किया, जिसने बीमा राशि को घटाकर 53,543 रुपये कर दिया, जिसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुनावाई के दौरान अदालत ने पाया कि सर्वेक्षक का यह निष्कर्ष कि शॉर्ट-सर्किट अपीलकर्ता के कारण हुआ था किसी भी साक्ष्य पर आधारित नहीं था।
पीठ ने बीमित राशि देने का दिया आदेश
पीठ ने कहा इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि सह-यात्री भी चोट के कारण मर गया था, यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि वह खाई में गिरे वाहन में शॉर्ट-सर्किट को कैसे रोक सकता था। कोर्ट ने पाया कि शॉर्ट-सर्किट का कारण अपीलकर्ता नहीं था और एनसीडीआरसी का आदेश खारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट ने राज्य आयोग के आदेश को बहाल करते हुए अपीलकर्ता को पूरी बीमित राशि 5.02 लाख रुपये देने का निर्देश दिया।