सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक रिटायर्ड कर्नल और एक प्रोफेसर को राहत दी है। दरअसल, पूर्व सेना अधिकारी के खिलाफ पिछले साल प्रकाशित उनकी पुस्तक की सामग्री को लेकर तथा प्रोफेसर पर सार्वजनिक रूप से दिए गए उनके कथित भाषण को लेकर मणिपुर में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। हालांकि, अब दोनों को शीर्ष अदालत ने किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से राहत दे दी है।
बता दें, पूर्व सेना अधिकारी विजयकांत चेनजी और प्रोफेसर हेनमिनलुन ने सुरक्षा और मणिपुर में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं।
इस पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने सुनवाई की। उन्होंने उनकी इस दलील पर ध्यान दिया कि कोई भी वकील इस मामले को लेकर मणिपुर उच्च न्यायालय में पेश होने के लिए तैयार नहीं है।
इस पर पीठ ने कहा कि नोटिस जारी करें। हम आपसे एक हलफनामा दायर करने के लिए कहेंगे कि कोई भी वकील नहीं है, जो मणिपुर उच्च न्यायालय में आपके लिए पेश होने को तैयार हो। पीठ ने कहा कि सुनवाई की अगली तारीख तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाएगा।
मणिपुर सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कुछ लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट आ जाते हैं। यह एक पैटर्न बनता जा रहा है। मेहता ने पीठ से ऐसी याचिकाओं पर विचार नहीं करने का आग्रह किया, जिन्हें मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा निपटाया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि हमें खुद को संतुष्ट करना होगा कि वकील पेश नहीं हो रहे हैं। फिर हम कानूनी सहायता की व्यवस्था करेंगे या उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से रिपोर्ट मांगेंगे। पीठ ने कहा कि हम सुरक्षा की मांग और एफआईआर को रद्द करने की मांग वाले मामलों से सीधे तौर पर निपटना नहीं चाहते।
दरअसल, रिटायर्ड सेना अधिकारी ने पिछले साल जनवरी में ‘द एंग्लो-कुकी वॉर 1917-1919’ पुस्तक प्रकाशित की थी। इस किताब की सामग्री को लेकर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थी, जिसे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। वहीं, हेन्मिनलुन के खिलाफ उनके कथित नफरत भरे भाषणों के लिए एक एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने कहा कि इन मामलों को लेकर जो वकील पेश हो रहे थे, उन्हें पीछे हटना पड़ा। क्योंकि उन वकीलों के चैंबर में तोड़फोड़ की गई और हमला किया गया। ग्रोवर ने कहा कि वह एक सेवानिवृत्त कर्नल हैं। किताब में विवाद के बारे में एक शब्द भी नहीं है, सिर्फ सैन्य रणनीतियों के बारे में लिखा गया है।
राहत देते हुए पीठ ने कहा कि यह एक सेवानिवृत्त कर्नल हैं। उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। एकमात्र सवाल यह है कि क्या हमें उनकी रक्षा करनी चाहिए और इसे वापस (उच्चतम न्यायालय) भेजना चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि उन्हें किसी विशेष मामले के दिए गए तथ्यों और स्थिति में शीर्ष अदालत द्वारा सुरक्षा देने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन असली मुद्दा राज्य उच्च न्यायालय के कामकाज के दौरान एक वर्ग द्वारा सीधे शीर्ष अदालत में जाने के पैटर्न का है। ग्रोवर ने कहा कि केवल एक वर्ग को शीर्ष अदालत में आने के लिए मजबूर किया गया था और आरोप लगाया कि इन लोगों को एफआईआर की प्रति भी आसानी से नहीं दी गई थी।