सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह इस आधार पर एक व्यक्ति की जमानत याचिका को खारिज करने में इलाहाबाद हाई कोर्ट के नजरिए की सराहना नहीं कर सकता कि अपील को सुना ही जाना चाहिए, क्योंकि यह बड़ी संख्या में पहले से लंबित अपीलों को जोड़ देगा। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और अपीलकर्ता को जमानत दे दी। अदालत ने देखा कि आज की तारीख में वह व्यक्ति 14 साल से अधिक की सजा काट चुका है, जबकि उसकी अपील हाई कोर्ट के समक्ष सात साल से लंबित है। इस व्यक्ति ने अक्टूबर 2013 के एक निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील के लंबित रहने के दौरान जमानत की मांग करते हुए हाई कोर्ट के समक्ष आवेदन दायर किया था, जिसने उसे एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराया था और सजा सुनाई थी।
शीर्ष अदालत ने उल्लेख किया कि अपीलकर्ता की जमानत याचिका को हाई कोर्ट ने दिसंबर 2019 में यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि कागजात दो सप्ताह के भीतर तैयार किए जाने चाहिए और इसके तुरंत बाद सुनवाई के लिए मामले को सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।
पीठ को सूचित किया गया कि उसके बाद तीन बार अपीलकर्ता ने मामले को सूचीबद्ध करने के लिए आवेदन दिया था और इसे पिछले साल अक्टूबर में सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन इस पर विचार नहीं किया गया। पीठ ने कहा, जमानत की जांच करने के बजाय इसे केवल इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि अपील पर सुनवाई होनी ही चाहिए, इससे समस्या का हल नहीं होता क्योंकि इलाहाबाद हाई कोर्ट में बड़ी संख्या में अपील लंबित है। अदालत ने कहा कि जमानत के मामलों को लेकर दृष्टिकोण अदालत पर और दबाव डाल रहा है। यह इस तरह का एकमात्र मामला नहीं है जिसे हमने देखा है।
पीठ ने कहा कि अगर हाई कोर्ट के आदेश की तारीख को भी ध्यान में रखा जाता है, तो अपीलकर्ता तब तक लगभग 12 साल हिरासत में बिता चुका होगा और अगर अपील लंबित है, तो कोई कारण नहीं दिखता कि इस तरह की जमानत क्यों नहीं दी जानी चाहिए।