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Supreme Court: 'उसके लिए लगातार कैद मृत्युदंड के समान'; आतंकी विस्फोट मामले में दोषी के समर्थन में शीर्ष कोर्ट

Mon, 08 Apr 2024 10:51 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

हबीब अहमद खान को 1993 में सिलसिलेवार ट्रेन विस्फोटों के सिलसिले में 1994 में गिरफ्तार किया गया था। 2004 में अजमेर ट्रायल कोर्ट ने 14 अन्य लोगों के साथ उसे आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (टाडा) के तहत दोषी ठहराया था।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में 1993 के ट्रेन विस्फोट मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे और फिलहाल पैरोल पर चल रहे एक 96 साल के बीमार दोषी की सजा में छूट का समर्थन किया है। शीर्ष कोर्ट की न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने बम विस्फोट मामले में दोषी हबीब अहमद खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान सरकार को मानवीय नजरिए से देखने का निर्देश दिया। 

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गौरतलब है कि  हबीब अहमद खान ने अपनी बिगड़ते स्वास्थ्य और उम्र का हवाला देते हुए शीर्ष कोर्ट से स्थायी पैरोल की मांग की थी। शीर्ष अदालत में याची के वकील ने कहा कि वह 27 साल से अधिक समय से जेल में हैं। जिसके बाद उन्हें तीन बार पैरोल दी गई। तीसरी पैरोल अब इस अदालत द्वारा समय-समय पर बढ़ाई जा रही है। ऐसे में उन्हें स्थायी पेरोल दी जाए। 

इसके बाद पीठ ने हबीब अहमद खान की मेडिकल रिपोर्ट्स को देखने के बाद राजस्थान का पक्ष रख रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी से उनकी माफी पर विचार करने और मामले को मानवाधिकार के नजरिए से देखने को कहा। साथ ही पीठ ने कहा, 'जरा उसकी मेडिकल रिपोर्ट देखिए, वह कहां जाएगा। यह सबसे खराब है। हां, उसे एक आतंकी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था लेकिन उसे मृत्युदंड नहीं दिया गया। उसके लिए लगातार कारावास मृत्युदंड के समान है।'
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इस पर एएसजी ने कहा कि सजा में छूट के लिए दोषी को राज्य सरकार के पास आवेदन करना होगा, लेकिन मौजूदा मामले में आतंकवादी अपराध के लिए उसकी सजा एक बाधा होगी। इस पर न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि 96 साल की उम्र में खान सिर्फ अपने दिन गिन रहे हैं और कानून इतना असंवेदनशील नहीं हो सकता। जिसके बाद अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने कहा कि इस अदालत के पास दुनिया की सभी शक्तियां हैं और अगर उसे छूट के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का उपयोग करना है, तो मैं ऐसा नहीं करने का आग्रह करूंगा। यह  छूट केवल राज्य सरकार ही दे सकती है।  दलीलें सुनने के बाद पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी से कहा कि वे सलाह लेकर बताएं कि क्या खान को छूट या स्थायी पैरोल दी जा सकती है। बाद में पीठ ने मामले को दो सप्ताह के बाद के लिए सूचीबद्ध किया। 

बता दें कि हबीब अहमद खान को 1993 में सिलसिलेवार ट्रेन विस्फोटों के सिलसिले में 1994 में गिरफ्तार किया गया था। 2004 में अजमेर ट्रायल कोर्ट ने 14 अन्य लोगों के साथ उसे आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (टाडा) के तहत दोषी ठहराया था। शीर्ष अदालत ने 2016 में खान की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था। हालांकि बाद में शीर्ष अदालत ने 2021 में उन्हें पैरोल दी थी। उस समय वह जयपुर जेल में बंद थे।

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