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Supreme Court: पीएसयू कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से राहत, इस वजह से जा सकती थी इनकी नौकरी, जानें पूरा मामला

Wed, 28 Aug 2024 08:26 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी श्रेणियों के तहत नौकरी पाने के लिए नोटिस का सामना कर रहे पीएसयू कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। जिन्हें सिर्फ इस आधार पर नौकरी से निकाला जा सकता था, कि उनकी जाति को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची में जोड़ा गया था।
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Supreme Court - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट बुधवार को केंद्र सरकार और पीएसयू बैंकों के कुछ कर्मचारियों को बचाने के लिए आगे आया, जिन्हें इस आधार पर नौकरी से निकाले जाने का खतरा था कि उनकी जाति, जिन्हें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची में जोड़ा गया था, बाद में कर्नाटक सरकार की तरफ से उन्हें अनुसूचित जाति से हटा दिया गया।
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न्यायमूर्ति हिमा कोहली और संदीप मेहता की पीठ ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक फैसले को खारिज करते हुए कहा, हम मानते हैं कि अपीलकर्ताओं को कारण बताने के लिए नोटिस जारी करने में प्रतिवादी बैंकों/उपक्रमों की प्रस्तावित कार्रवाई को बरकरार नहीं रखा जा सकता है और इसे रद्द किया जाता है।

कंपनी-बैंकों ने मांगा था नोटिस का जवाब
के निर्मला समेत कोटेगारा अनुसूचित जाति और कुरुबा अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को उनके संबंधित नियोक्ताओं - केनरा बैंक, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की तरफ से जारी किए गए नोटिस का जवाब देने के लिए कहा गया था। पीएसयू नियोक्ताओं ने कहा था कि इन कर्मचारियों की जातियां और जनजातियां अब एससी और एसटी का हिस्सा नहीं हैं और इसलिए उन्हें अपनी नौकरियों में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो आरक्षित श्रेणियों के तहत अर्जित की गई थीं।
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याचिकाओं पर फैसला करते हुए, पीठ ने कहा कि आम सूत्र यह है कि क्या कोई व्यक्ति, जो कर्नाटक में एससी या एसटी प्रमाण पत्र के आधार पर किसी राष्ट्रीयकृत बैंक या भारत सरकार के उपक्रम में सेवा में शामिल हुआ है, राज्य के निर्णय के अनुसार, जाति या जनजाति को अनुसूचित जाति से बाहर कर दिए जाने के बाद भी पद पर बने रहने का हकदार होगा। हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अपीलकर्ता 29 मार्च, 2003 के सरकारी परिपत्र के आधार पर अपनी सेवाओं के संरक्षण के हकदार हैं। कर्नाटक सरकार की तरफ से जारी 29 मार्च, 2003 के परिपत्र में विशेष रूप से कई जातियों को संरक्षण प्रदान किया गया था, जिनमें वे जातियां भी शामिल थीं जिन्हें 11 मार्च, 2002 के पहले के सरकारी परिपत्र में शामिल नहीं किया गया था।

वहीं फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि इसके बाद के परिपत्र में कोटेगारा, कोटेक्शात्रिय, कोटेयावा, कोटेयार, रामक्षत्रिय, शेरुगारा और सर्वेगरा जैसी जातियों को शामिल किया गया, इस प्रकार यह सुनिश्चित किया गया कि इन जातियों के व्यक्ति, जिनके पास अनुसूचित जाति प्रमाणपत्रों को हटाने से पहले जारी किया गया था, वे सभी भविष्य के उद्देश्यों के लिए अनारक्षित उम्मीदवारों के रूप में अपनी सेवाओं के संरक्षण का दावा करने के हकदार होंगे।

कर्मचारियों ने उचित प्रक्रिया का पालन करके हासिल किए थे प्रमाण पत्र
पीठ ने कहा कि इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि अपीलकर्ता कर्मचारियों ने कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करके अपने एससी और एसटी प्रमाण पत्र प्राप्त किए थे। पीठ ने कहा, जब ये जाति प्रमाण पत्र जारी किए गए थे, तो अपीलकर्ताओं की पर्यायवाची जाति, कर्नाटक सरकार की तरफ से जारी परिपत्र के आधार पर अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल की गई थी। 
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