यदि सरकारें किसी अन्य मुद्दे पर घिरी होतीं, तो संभव है कुछ सौभाग्यशाली अभागों को यह सुविधा मिल भी जाती, अन्य आंदोलन चुनाव समाप्ति के पश्चात ठंडे पड़ जाते। और इस पूरी प्रक्रिया में चुनिंदा उत्पाती छुट-भइये नेता अपनी काली मनसिकता और उससे भी काले चरित्र को उज्ज्वल करने में सफल हो जाते।
मुझे ज्ञात है, 'मुंह काला होना' होना मात्र एक मुहावरा है, पर महोदय, मेरी आपत्ति भी इसी से है। जो हम पहले से ही हैं, उसे मुहावरे में प्रयुक्त कर हमें क्यों निंदा के पात्र बनाना चाह रहे हैं? यदि गुस्से में चेहरा लाल पीला, लज्जा में लाल, और भय में नीला हो सकता है, तब बुरी नजर रखने वाले दुष्ट व्यक्ति का मुंह बैंगनी क्यों नहीं हो सकता। इससे एक कड़ा संदेश भी साथ जाएगा, कि ऐसे दुष्ट व्यक्ति का बैंगन की तरह ही भर्ता भी बनाया जा सकता है। ऐसे घृणित व्यक्ति की दूर से ही पहचान भी की जा सकती है, नहीं तो अब तक बुरी नजर वाले काले व्यक्ति समाज के अन्य भद्र किंतु 'काले' मनुष्यों में सुलभता से घुल मिल जाते हैं।
समाज में स्वयं को कम काला घोषित करने की होड़ वास्कोडिगामा के जहाज के भारतीय तट पर लंगर डालने के तुरंत बाद ही आरंभ हो गई थी। अंग्रेजों के जमाने में हम स्वयं को 'ब्राउन' साबित कर उच्च पद पाना चाहते थे। और अब भी, गोरापन लाने की क्रीमों से दुकानें पटी पड़ी हैं। किसी तरह हमारा चेहरा कम काला हो जाये, इसकी होड़ मची हुई है। वैवाहिकी विज्ञापन के लिए एक नए रंग की खोज भी की गई - 'गेंहुआ' - इसके क्या उद्देश्य हैं और ये किस रंग विशेष को इंगित करता है, मुझे इसकी समझ नहीं। पर इस मानसिकता से पूरे समाज में किस स्तर तक निराशा, हीनता व दुर्भावना फैली है, इसका मुझे भान अवश्य है। ये कैसा समाज है मित्रों, जहां बुरी नजर होना तो स्वीकार्य है परंतु काला चेहरा होना एक अभिशाप!
अत: सम्माननीय सदस्यों के समक्ष मैं प्रस्ताव रखता हूं कि आने वाले समय में, 'बुरी नजर वाले, तेरा बेटा जिए और बड़ा होकर तेरा खून पिये' का समर्थन करें और उज्ज्वल देश के काले लोगों का उत्साहवर्धन करें। वह गीत तो आपको याद है न, 'हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं'। सोलह आने सच!
॥इति॥
लेखक परिचय:
डॉ. आशीष जैन,
वरिष्ठ परामर्शदाता
श्वास रोग विभाग
मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल
साकेत, नई दिल्ली