शपथपत्र में कहा गया था संजीव को दे दिया गया काम
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उत्तराखंड के वर्ष-2002 बैच के भारतीय वन सेवा अधिकारी संजीव चतुर्वेदी पिछले कई माह से अपने लिए काम मांग रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें न तो एम्स-प्रशासन और न ही कोर्ट से कोई राहत मिली है। काम देने की अर्जी पर सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के दो जजों की बेंच ने अलग-अलग विचार व्यक्त कर दिए। लिहाजा इस मामले को कैट के चेयरमैन के पास भेजा गया है। संजीव को काम देने के संबंध में एम्स की ओर से गलत शपथपत्र देने के मामले को बेंच ने गंभीरता से लिया और पूरे मामले की जांच कर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए।
बेंच ने यह भी कहा कि इसकी जिम्मेदारी एम्स निदेशक की बनती है, लेकिन चूंकि चिकित्सा क्षेत्र में उनका बड़ा योगदान है इसलिए उनके खिलाफ इस मामले में कोई जुर्माना लगाने का निर्णय नहीं लिया जा रहा है। दरअसल संजीव चतुर्वेदी एम्स में बतौर डिप्टी सेक्रेट्री कार्यरत हैं, लेकिन उनके पास काम नहीं है। मामले की सुनवाई के दौरान बेंच के एक जज ने कहा कि एम्स में किस अधिकारी के पास क्या काम होना चाहिए और किस से क्या काम लेना है इस पर फैसला लेने का पूरा अधिकार एम्स निदेशक के पास है। जबकि दूसरे जज ने कहा कि एम्स में डिप्टी सेक्रेट्री के लिए जो काम तय किया गया था उसे मिलना चाहिए और एम्स का शपथपत्र भी यही कहता है।
जज की राय
बेंच के एक जज ने आदेश में याचिकाकर्ता संजीव चतुर्वेदी के बारे में लिखा कि इस अधिकारी ने जो रास्ता चुना है वह बहुत कठिन है। इनकी इमानदारी पर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ इनका काम भी सराहनीय रहा है। रमन मैग्सेसे अवार्ड की राशि इन्होंने एम्स को दी लेकिन एम्स ने इसे लेने से इनकार कर दिया तो इन्होंने इस राशि को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में दे दी।