मुजफ्फरनगर दंगों के बाद मुस्लिम मतदाताओं को साथ लाना बन सकता है चुनौती
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समाजवादी पार्टी और रालोद के गठबंधन की संभावनाओं के बीच पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का ‘अजगर’ फार्मूला फिर से चर्चा में है। इस समीकरण में मुस्लिमों को बड़े चौधरी देश की बड़ी सियासी ताकत बन गए थे। ऐसे में यदि अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत (अजगर) समीकरण बना तो यूपी की सियासत नये सिरे से प्रभावित हो सकती है। हालांकि, मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट और मुस्लिम वर्ग के बीच दूरी बढ़ने की बात सामने आई है। इन हालात में बड़े चौधरी के ‘अजगर’ फार्मूले में मजबूती से साथ रहे मुस्लिम वर्ग को साथ लाना बड़ी चुनौती होगी।
मिशन-2017 के लिए सपा हर नया दांव चलने को तैयार नजर आ रही है। हारी हुई सीटों पर टिकट घोषित करने के बाद जातिगत समीकरण साधने की तैयारी हुई। ठाकुर वर्ग में संदेश देने के लिए प्रो. रामगोपाल की कथित असहमति के बावजूद ठा. अमर सिंह को राज्यसभा का प्रत्याशित घोषित किया गया। इसके बाद वेस्ट यूपी में मुस्लिमों के साथ गुर्जर वोटों को अपने पाले में लाने के लिये अचानक सुरेंद्र नागर को राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया। अब बदलते घटनाक्रम में रालोद के साथ गठबंधन की बात कही जा रही है। ऐसे में दोनों पार्टियों में गठबंधन के समर्थक रहे चौ. चरण सिंह का ‘अजगर’ फार्मूला चर्चा में आ गया है।
उस समय इन किसान बिरादरियों के साथ मुस्लिम वोटर साथ रहा था और चौ. चरण सिंह प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे थे। दरअसल, पश्चिम में सपा के पास परंपरागत यादव मतदाता नहीं हैं। इसी कारण पहले गुर्जर वोटों पर डोरे डाले गए और अब चौ. अजित सिंह को साथ लेने की कवायद की जा रही है। पश्चिम में भाजपा की स्थिति मजबूत रही है। लोकसभा चुनाव में भाजपा पूरी तरह से सूपड़ा साफ कर चुकी है। ऐसे में सपा यह संदेश देना चाहती है कि भाजपा को हराने के लिये वह एक मजबूत गठबंधन तैयार कर रही है।
वहीं, दूसरे दलों के साथ बात न बनने के बाद रालोद के पास भी ज्यादा विकल्प नहीं हैं। पश्चिम में जाट वोटरों की संख्या अच्छी-खासी है और यहां के सभी जिलों में यह निर्णायक की भूमिका अदा कर सकती है। लोकसभा चुनाव में जाट वोटर भाजपा के साथ चला गया था और चौ. अजित सिंह और जयंत चौधरी भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। जाट आरक्षण सहित दूसरे मुद्दों पर रालोद जाट वोटरों को अपनी ओर लाना चाहता है और गठबंधन के साथ पार्टी को दोबारा मजबूती से खड़ा करना चाहता है। हालांकि, अभी इस बात पर भी संशय है कि चौ. अजित सिंह को राज्यसभा का प्रत्याशी घोषित करने पर सपा किसका टिकट काटेगी।
दूरी मिटाना होगी बड़ी चुनौती
मुजफ्फरनगर दंगे को सपा नेताओं ने जाट और मुस्लिमों के बीच जातीय संघर्ष बताया था। वहीं, दंगे पर चौ. अजित सिंह ने चुप्पी साध ली थी। जाट और मुस्लिम रालोद का वोटर रहा है, लेकिन दंगे के बाद जाट भाजपा के साथ गया तो मुस्लिमों ने भी उसका साथ नहीं दिया था। जाट वोटरों के कारण ही सपा रालोद का साथ चाहती है और पश्चिम में मुस्लिमों ने सपा का साथ दिया है। ऐसे में दोनों वर्गों को साथ लाना सपा और रालोद दोनों के लिए ही चुनौती होगा। हालांकि, दोनों दलों के नेता कह रहे हैं कि पश्चिम में भाजपा को हराने के लिए संभावित गठबंधन मजबूत विकल्प साबित हो सकता है।