राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट पर तुलसीदास जी द्वारा लिखी गई ये पंक्तियां खूब फबती हैं। ऊर्जा से भरे सचिन प्रबंधन कला में मास्टर हैं। उनकी यह खूबी राजनीति में चर्चित है। यह संयोग ही है कि दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कालेज के स्नातक सचिन पायलट पेंसिलवानियां विश्वविद्यालय (अमेरिका) के व्हाटर्न स्कूल से एमबीए भी हैं।
इस समय वह दिन रात राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनवाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। हालांकि कांग्रेस सरकार बनने की दशा में मुख्यमंत्री बनने के लिए सचिन पायलट का पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के चेहरे से दमदार मुकाबला हो सकता है।
युवा सांसद से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तक
सचिन पायलट कोई 26 साल के थे, जब राजस्थान की दौसा सीट (पिता राजेश पायलट की परंपरागत) से 14 वीं लोकसभा के लिए 13 मई 2004 को सांसद चुने गए थे। 2009 में फिर सांसद चुने गए, केंद्र सरकार में मंत्री बने और सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि युवा सचिन क्रिकेट के सचिन की तरह काफी अच्छा कामकाज का रिकॉर्ड बनाया।
दूरसंचार मंत्रालय में राज्यमंत्री के तौर पर उन्होंने कई कदम उठाए। मृदुभाषी, तर्कपूर्ण बात करने वाले, होमवर्क में जमकर विश्वास रखने वाले सचिन पायलट एक अच्छे रणनीतिकार हैं। राजनीति की भाषा में भी वह पिता की तरह बिना किसी लॉग लपेट के बोलते हैं। विरोधी पर बिल्कुल सीधा और सधा हुआ हमला।
पिछले चार साल में उन्होंने राजस्थान में सरकार विरोधी लहर को जन-जन तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उनका होमवर्क राजस्थान में हुए उपचुनाव में भी दिखाई दिया। भाजपा उपचुनाव में बुरी तरह पराजित हुई और उसका मनोबल भी कमजोर हुआ।
जाहिर है युवा सचिन के ये प्रयास उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए पर्याप्त थे। सचिन पायलट कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अच्छे दोस्त भी हैं। इसके अलावा वह राहुल गांधी की कांग्रेस को युवा बनाने के खांचे में भी फिट बैठते हैं।
सीधा मुकाबला
Sachin Pilot, Ashok Gehlot
सचिन पायलट का सीधा मुकाबला राजस्थान की दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी वसुंधरा राजे से है। वह राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़े जाने वाले चुनाव में भाजपा का विजय रथ रोकने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। इसके साथ-साथ सचिन भीतर-भीतर अशोक गहलोत के साथ भावी मुख्यमंत्री के प्रतिदंद्विता की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। सचिन गुज्जर समुदाय से हैं।
राजस्थान में गुज्जर बनाम मीणा खूब चल रहा है। यह लड़ाई आरक्षण आंदोलन से शुरू हुई है। यह सचिन पायलट को मिलने वाले जन समर्थन में भी सवाल खड़ा करने वाली मानी जाती है, लेकिन सचिन के करीबी बताते हैं कि उन्होंने इस पर भी काफी हद तक काबू पा लिया है। वह राजस्थान में सीपी जोशी, गिरजा व्यास, भवर जितेन्द्र सिंह जैसे कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में भी सामंजस्यपूर्ण समीकरण बनाने में सफल हो चुके हैं।
राजनीति के 16 साल
सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट देश के उम्दा किस्म के केंद्रीय नेता थे। हंसमुख, मिलनसार कद्दावर राजेश पायलट का सड़क दुर्घटना में असमय देहांत हो गया था। बाद में सचिन पायलट ने उनके जन्मदिन (10 फरवरी) को 2002 में राजनीति में दाखिला लिया। वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए।
2004 के लोकसभा चुनाव से अब तक लगातार अपनी सीट जीतते रहे। राजनीति के इन 16 साल (41 साल की उम्र में) में सचिन ने अभी तक केवल सफलताएं देखी हैं। यह चुनाव में उनके प्रबंधन कौशल, राजनीतिक समझ, दांव-पेंच और जोर अजमाइश की अग्नि परीक्षा होनी है। सफल हुए आगे की राजनीतिक यात्रा शानदार है और यदि किस्मत ने गच्चा दे दिया तो जीवनभर के लिए एक गांठ भी मिलनी तय है।
गढ़ते हैं नारा, उठाते हैं आवाज
राजस्थान का उपचुनाव बताता है कि सहयोगियों को संगठित करके लक्ष्य को हासिल कर लेने में सचिन पायलट का जवाब नहीं है। वह जमीनी तैयारी से लेकर नारा गढ़ने, सरकार के खिलाफ आवाज उठाने, जमीनी आंदोलन छेड़ देने की पूरी तैयारी में अंत तक डटे रहते हैं। किसानों के लिए वसुंधरा सरकार की पहल की हवा निकालने में उन्होंने जरा भी देर नहीं लगाई।
बूथ जिताओ, बाजपा हराओ, भ्रष्टाचार भगाओ का नारा खूब प्रचलित रहा। 51 हजार बूथों पर कांग्रेस पार्टी का अभियान चलाने में उन्होंने पूरी जान लड़ा दी। जब सचिन पायलट बोले की राजे शेरनी हैं, लेकिन उनका सबसे बड़ा शिकार किसान है तो जनता ने खूब तालियां बजाई। यह सचिन पायलट ही हैं जिन्होंने राजस्थान में बसपा या किसी दल से गठबंधन न करने की मजबूती से राह पकड़ी और कहा कि कांग्रेस दो तिहाई से अधिक बहुमत लेकर आएगी। देखना है, आगे क्या होता है।