अटल जी की उदारता और वाकपटुता, कार्य व्यहार के जरिए अनुशासन तथा पार्टी का चेहरा बनाने में उनका कोई सानी नहीं रहा। लाल कृष्ण आडवाणी संगठन को मुट्ठी में रखने वाला नेतृत्व देने के तौर पर जाने गए। अनुशासन का सख्ती से पालन किया। शत्रुघ्न सिन्हा को तीसरी बार राज्यसभा नहीं मिल पाई।
पार्टी के केंद्र में सरकार बनाने के बाद जनाकृष्णमूर्ति, बंगारू लक्ष्मण जैसे चेहरों ने कमान संभाली। एक बार फिर लाल कृष्ण आडवाणी पार्टी के अध्यक्ष बने। इसके बाद आरएसएस से करीबी रिश्ते ने राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी को भी यह अवसर दिया, लेकिन भाजपा एक वाच्या नहीं रही। यह अध्यक्ष भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की छाया में ही रहे।
इसके सामानांतर 2014 में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर कमान संभाली। चार साल का शानदार समय गुजारा है। पार्टी के भीतर और बाहर भय, अनुशासन, संगठन में लगातार तैयारी, भावी योजना पर काम, रणनीतिक दक्षता समेत अन्य को बनाए रखा है। एक दो नेताओं को छोड़ दें तो पूरी पार्टी एक अनुशासन में चल रही है।
इतना ही नहीं नये दौर में आरएसएस को भरपूर लाभ मिला है, लेकिन भाजपा अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को तरजीह दी है। इससे पार्टी, सरकार और संघ के बीच में समन्वय बनाए रखने में सफल रहे और तीनों प्लेटफार्म पर आपस में टकराव जैसी स्थिति नहीं आई।
दिया नया मुकाम
अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में अमित शाह ने भाजपा को शीर्ष पर पहुंचाया। दिल्ली, बिहार, पंजाब को छोड़कर भाजपा ने अपना परचम लहराया। गोवा और मणिपुर में पिछड़ी जरूर लेकिन सरकार बनाने में सफल रही। कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी सरकार बनाने में पिछड़ गई, लेकिन बिहार में सत्ता में साझीदार बनकर आधार बढ़ा लिया।
मिजोरम में पार्टी ने राजनीतिक कद बढ़ाया तो त्रिपुरा में सरकार बनाने में सफल रही। इस तरह से 2014 के बाद से हुए सभी राज्यों के चुनाव में उपरोक्त को छोड़कर पार्टी ने सबकुछ हासिल किया। उपचुनाव जरूर चिंता का विषय रहे, लेकिन यह अमित शाह की रणनीतिक सूझ बूझ ही है कि भाजपा सदस्यों की संख्या और धनबल के मामले में देश का शीर्ष राजनीतिक दल है। पार्टी के पास दिल्ली में अपना आलीशान राजनीतिक मुख्यालय है और भाजपा सदस्यों की संख्या दस करोड़ को पार कर चुकी है।
अमित शाह की निगाह चिड़िया की एक आंख पर रहती है। वह उसके इर्द गिर्द तैयारी का जाल बुनते हैं। विरोधियों को अपने तैयारी की भनक नहीं लगने देते। मीडिया को भी उनके राज का बहुत कम अंश ही मालुम हो पाता है। वह अपने हिसाब से मीडिया, एजेंसी, चुनाव तैयारी में लगे लोग, नेता, प्रत्याशी, प्रचार अभियान के लोग सबसे रिश्ता रख लेते हैं।
राजस्थान में वसुंधरा राजे के साथ राजनीतिक तैयारी का रास्ता बनाने में सफल रहे तो शिवराज को उनकी इच्छा से समझौता कराकर राकेश सिंह को भाजपा अध्यक्ष बनवाया। उत्तर प्रदेश में छोटे-छोटे जनाधार वाले नेताओं को तोड़कर सबको हतप्रभ कर दिया। वह मतदाता सूची के हर पन्ने की जिम्मेदारी सौंपने से लेकर राज्य के प्रभारी और महासचिव के साथ मिलकर नई योजना पर काम करने बखूबी संचालन कर लेते हैं।
प्रधानमंत्री के विश्वास पात्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दो जिस्म और एक जान जैसे लगते हैं। एक दूसरे के बीच में इतनी गहरी समझ और इतनी गहराई से निर्भरता का उदाहरण कम है। भाजपा अध्यक्ष प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुरूप हर रोड मैप तैयार कर लेते हैं। वह हर चुनाव में प्रधानमंत्री को पार्टी का एकमात्र चेहरा बनाए रखने में सफल हैं। कम बात करना, ज्यादा काम करना और समय पर अच्छा परिणाम देना अमित शाह की फितरत में है।
आरोप से चोली दामन का साथ
अमित शाह का कभी आरोप ने पीछा नहीं छोड़ा। हालांकि उनके ऊपर लगे कई आरोपों की पृष्ठभूमि में कहीं न कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। वह गुजरात में गृहमंत्री थे तब पहली बार उन पर गंभीर आरोप लगे थे। इन आरोपों ने उन्हें जेल तक पहुंचाया। राज्य में प्रवेश पर पाबंदी तक लगी। गुजरात दंगे से लेकर सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ कांड और अन्य। जस्टिस लोया की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु में भी उनका नाम आया।
आज भी अमित शाह पर आरोप लगाने वाले दुश्मनों की कमी नहीं है। पार्टी के भीतर भी और बाहर भी। उनपर भाजपा को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, निजी कंपनी या फिर मर्यादा को तोड़कर पार्टी चलाने का आरोप लगता रहता है।
कहने वाले यहां तक कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी की सरकार न होती तो अमित शाह की जगह जेल में होती। पार्टी में उन पर तानाशाह की तरह कामकाज करने का भी आरोप लगता है, लेकिन शाह किसी की परवाह नहीं करते। एक के बाद एक लक्ष्य को पाना ही उनकी फितरत है।