विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत और रूस के रिश्तों पर बात करते हुए यूरोपीय देशों को स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि हर देश अपने अनुभवों के आधार पर दूसरे देशों के साथ संबंध तय करता है। जिस तरह यूरोप रूस को लेकर भारत के नजरिये से फैसला नहीं कर सकता, उसी तरह भारत भी रूस के साथ अपने रिश्तों को यूरोप के नजरिये से नहीं देख सकता। जयशंकर ने कहा कि भारत का रूस के साथ अनुभव सकारात्मक रहा है और दोनों देशों के बीच लंबे समय से भरोसे का रिश्ता है।
'जब पश्चिमी देश पाकिस्तान के साथ खड़े थे, तब रूस ने भारत का साथ दिया'
जर्मनी में एक कार्यक्रम के दौरान जयशंकर ने भारत और रूस के पुराने संबंधों का जिक्र किया। उन्होंने 1950 के दशक की ओर इशारा करते हुए कहा कि उस दौर में पश्चिमी देश पाकिस्तान की सैन्य तानाशाही वाली सरकार का समर्थन कर रहे थे। इसके बाद उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का भी जिक्र किया। जयशंकर के मुताबिक, उस समय जब अमेरिका ने भारत के खिलाफ अपने युद्धपोत भेजने का फैसला किया था, तब सोवियत संघ ने भी अपनी नौसेना भेजी थी। इन घटनाओं ने भारत और सोवियत संघ के बीच भरोसे को मजबूत किया।
1970 और 1980 के दशक में और गहरे हुए रिश्ते
जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस की साझेदारी समय के साथ और मजबूत हुई। 1970 और 1980 के दशक में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा। इसमें सैन्य सहयोग, परमाणु क्षेत्र और व्यापार शामिल थे। उन्होंने कहा कि भारत और रूस के संबंध समय के साथ बदलते रहे हैं। आज भी सैन्य हथियार और परमाणु क्षेत्र से जुड़ी सामग्री दोनों देशों के सहयोग का हिस्सा हैं, लेकिन अब उनके बीच बड़े पैमाने पर व्यापार भी होता है।
रूस से तेल खरीदने पर भारत को घेरते हैं अमेरिका और यूरोपीय देश
रूस आज भी भारत के लिए कच्चे तेल के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देश भारत पर सवाल उठाते रहे हैं। जयशंकर पहले भी इस मुद्दे पर भारत का पक्ष रख चुके हैं और यूरोपीय देशों के रवैये पर सवाल उठा चुके हैं। इसी विवाद के बीच अमेरिका ने भारत पर शुल्क भी लगाया था। भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी कदम को अनुचित और बेबुनियाद बताया था। भारत का पक्ष रहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और जरूरतों के आधार पर फैसले लेता है।
अमेरिका की बदली भूमिका और चीन का बढ़ता प्रभाव
इतना ही नहीं, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिका और चीन की चाल पर भी विस्तार से बातचीत की। उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में दुनिया के देशों को संतुलन बनाकर चलना होगा। म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में उन्होंने कहा कि उभरती और मध्यम ताकतों को किसी एक खेमे के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अपने हितों के हिसाब से फैसले लेने चाहिए।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में दो बड़े बदलाव दिखाई दे रहे हैं। पहला, अमेरिका की रणनीति में बड़ा बदलाव आया है। अमेरिका एक तरह से जानबूझकर अकेले चलने वाली ताकत बन गया है। दूसरा बदलाव चीन का बढ़ता प्रभाव है। उन्होंने कहा कि इन दोनों देशों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा चल रही है।
कैसे हो रहा है दुनिया में आर्थिक ताकत का इस्तेमाल?
विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि देशों के बीच बढ़ती निर्भरता के दौर में आर्थिक ताकत का इस्तेमाल भी प्रभाव बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि किसी सौदे में किसके पास ज्यादा ताकत होती है? सामान बेचने वाले के पास, खरीदने वाले के पास या उस देश के पास जो उत्पादन और बाजार पर ज्यादा नियंत्रण रखता है? उन्होंने कहा कि जिस देश की अलग-अलग क्षेत्रों में पकड़ मजबूत होगी और जो अपने हितों को लेकर ज्यादा प्रतिबद्ध होगा, वह अपनी ताकत का बेहतर इस्तेमाल कर सकेगा।
क्या है ‘गोल्डीलॉक्स स्थिति’?
अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा का जिक्र करते हुए जयशंकर ने ‘गोल्डीलॉक्स स्थिति’ की बात कही। उन्होंने कहा, 'आप नहीं चाहते कि हालात बहुत ज्यादा गर्म हों, आप यह भी नहीं चाहते कि वे बहुत अच्छे हों। आप चाहते हैं कि स्थिति सही तापमान पर, यानी बीच में रहे।' उनके मुताबिक, दुनिया को ऐसा संतुलन बनाए रखने की जरूरत है, जिससे दो बड़ी ताकतों के बीच प्रतिस्पर्धा से वैश्विक व्यवस्था अस्थिर न हो।
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आत्मनिर्भरता और नई साझेदारियों पर जोर
विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि वैश्विक उत्तर और वैश्विक दक्षिण के कई उभरते और मध्यम ताकत वाले देश अब अपने हितों को लेकर ज्यादा जागरूक हो रहे हैं। वे आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत में आत्मनिर्भरता के लिए 'आत्मनिर्भर' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। अब देश यह भी देख रहे हैं कि किसी बातचीत या समझौते में वे क्या योगदान दे सकते हैं और उससे उन्हें क्या फायदा होगा।
हर मुद्दे पर सहमति जरूरी नहीं: जयशंकर
विदेश मंत्री ने कहा कि देश अब अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े जोखिम कम करने के साथ आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं। इसके लिए वे अलग-अलग देशों के साथ साझेदारी कर रहे हैं और खास मुद्दों पर मिलकर काम करने के नए तरीके तलाश रहे हैं। उन्होंने कहा कि सहयोग के लिए हर मुद्दे पर एक जैसी राय होना जरूरी नहीं है। अगर कुछ मुद्दों पर सहमति है, तो देश साथ काम कर सकते हैं। उनके मुताबिक, जोखिम कम करने, साझेदारी बढ़ाने और साझा हितों पर काम करने से वैश्विक व्यवस्था का नया ढांचा तैयार हो रहा है।