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Russia Ukraine Crisis: पांच अरब डॉलर के बदले अमेरिका से यह चाहता था यूक्रेन! क्या साबित होगी जेलेंस्की की अब तक की सबसे बड़ी भूल?

आशीष तिवारी
Updated Mon, 28 Feb 2022 06:32 PM IST

सार

भारतीय विदेश सेवा से जुड़े पूर्व अधिकारी जयचंद्रन एस कहते हैं कि रूस ने जिस तरीके से आक्रामकता दिखाई है उससे पश्चिमी देश निश्चित तौर पर चिंता में हैं। वह कहते हैं कि दरअसल अब रूस की ओर से यूक्रेन पर किए गए हमले और रूस का आक्रामक रवैया यह इशारा करता है कि संभवतया रूस अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाना चाह रहा है, जिसके जद में यूरोप के कई छोटे-छोटे देश भी आ सकते हैं...
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बेलारूस में यूक्रेन और रूसी प्रतिनिधिमंडल की बैठक - फोटो : Agency


यही वजह रही कि जब रूस ने यूक्रेन को धमकाना शुरू किया और अपनी सेनाओं को अलर्ट किया तो बार-बार यूक्रेन और अमेरिका के बीच हुई मदद की बातचीत में एक मुद्दा पांच अरब डॉलर के सालाना व्यापार का भी रहा। इसी के बलबूते यूक्रेन अमेरिका से मदद चाह रहा था, बल्कि अपने देश में अमेरिकी सैनिकों को बड़ी पनाह भी देना चाह रहा था। विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका इस वक्त 2008 के बाद से आर्थिक मामलों में तंगी झेल रहा है। इसलिए अमेरिका वहां व्यापार हाथ से जाने नहीं देना चाहता था, लेकिन उसके ऊपर कूटनीतिक दबाव इतना था कि वह यूक्रेन की मदद नहीं कर सका।

रूस पर आर्थिक प्रतिबंध नाकाफी

भारतीय विदेश सेवा से जुड़े पूर्व अधिकारी जयचंद्रन एस कहते हैं कि रूस ने जिस तरीके से आक्रामकता दिखाई है उससे पश्चिमी देश निश्चित तौर पर चिंता में हैं। वह कहते हैं कि दरअसल अब रूस की ओर से यूक्रेन पर किए गए हमले और रूस का आक्रामक रवैया यह इशारा करता है कि संभवतया रूस अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाना चाह रहा है, जिसके जद में यूरोप के कई छोटे-छोटे देश भी आ सकते हैं। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि सिर्फ आर्थिक प्रतिबंधों से रूस झुकने वाला नहीं है। उसकी बड़ी वजह बताते हुए जानकार कहते हैं कि रूस के ऊपर निर्भरता सिर्फ यूरोपीय देशों की ही नहीं है बल्कि अमेरिका और कनाडा समेत दुनिया के तमाम सभी बड़े मुल्कों की भी है।



आर्थिक मामलों के जानकार मुकुंद देसाई कहते हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच में हो रहे विवाद को खत्म करने के लिए यूरोप के दो बड़े देश फ्रांस और जर्मनी बातचीत के माध्यम से हल निकालने के लिए हर तरह की पैरवी करते रहे। वह कहते हैं कि अमेरिका को इस बात का अंदाजा है कि बहुत ज्यादा आर्थिक प्रतिबंधों से यूरोपीय देशों और अमेरिका के आपसी हितों पर भी बड़ा असर पड़ेगा। यही वजह है कि विदेशी मामलों के जानकार और दुनिया के तमाम आर्थिक विशेषज्ञ इस बात को मानकर चल रहे हैं कि आर्थिक प्रतिबंध का रूस के ऊपर बहुत बड़ा फिलहाल असर नहीं पड़ने वाला है।

अमेरिका की गलत नीतियां जिम्मेदार

यूक्रेन में सीधे तौर पर दखल न देने के लिए अमेरिका की रणनीति को यूरेशिया इकोनॉमिक फोरम के जेएन रेड्डी अलग नजरिए से देखते हैं। वे कहते हैं कि अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कोई भी मुद्दे यूक्रेन से सीधे तौर पर जुड़े नहीं होते हैं। इसके अलावा यूक्रेन में अमेरिका का न कोई सैन्य ठिकाना है और न ही कोई सीधा और हस्तक्षेप। क्योंकि अफगानिस्तान में अमेरिका ने अपनी गलत नीतियों के कारण न सिर्फ हाथ जलाए हैं बल्कि खुद के देश में भी जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा है। यही वजह है कि 1995 में युगोस्लाविया और 2011 में लीबिया के गृह युद्ध में सीधे दखल देने वाले अमेरिका ने 2022 में हुए यूक्रेन युद्ध में अपने हाथ पीछे खींच लिए। रेड्डी कहते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन मानवाधिकारों के नाम पर एक दौर में बाल्कन और इराक में सैन्य हस्तक्षेप को समर्थन देते थे। लेकिन अफगानिस्तान जैसे हालातों में मात खाने के बाद उनको सोचने पर मजबूर कर दिया।

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