अफगानिस्तान में अपना कद बढ़ाने की कोशिशों में जुटा रूस इस महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए भारत को मुफीद नहीं मानता। भारत के पुराने मित्र को लगता है कि वर्तमान में चीन, पाकिस्तान और ईरान उसके लिए ज्यादा उपयोगी हैं। यही कारण है कि दशकों बाद पहली बार रूसी विदेश मंत्री ने भारत की यात्रा के तुरंत बाद पाकिस्तान का दौरा किया। बीते नौ साल में रूसी विदेश मंत्री की यह पहला पाकिस्तान दौरा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस न सिर्फ अफगानिस्तान में अमेरिका की भूमिका को न्यूनतम करना चाहता है, बल्कि अपनी भूमिका को निर्णायक बनाना चाहता है। उसे लगता है कि उसकी इस भूमिका को अंजाम देने में उसे भारत से सहयोग नहीं मिलेगा। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि नए वैश्विक परिदृश्य में भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताएं बदल गई हैं।
उसकी निगाहें एशिया या कम प्रभावी देशों के बदले बदले ताकतवर और विकसित देशों से संबंधों को मजबूत बनाने की है। यही कारण है कि चीन से जारी सीमा विवाद के बीच भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, फ्रांस, यूरोपीय देशों से अपने कूटनीतिक संबंधों को मजबूती देने में अपना ध्यान लगाया है। क्वाड इसी दृष्टि में आगे बढ़ने का एक सीधा संदेश है। रूस देख रहा है कि भारत के रिश्ते अमेरिका से प्रगाढ़ हो रहे हैं। भारत अब यह तय करने में जुटा है कि रक्षा सहित अन्य क्षेत्रों में रूस से संबंधों से कैसे चरणबद्घ तरीके से किनारा किया जाए।
पाकिस्तान-चीन को ढाल बना रहा है रूस
विशेषज्ञों का मानना है कि रक्षा क्षेत्र में सौदों के जरिये पाकिस्तान रूस से तात्कालिक जरूरतों को फौरी तौर पर पूरा करने में अक्षम है। चीन और ईरान को इस संबंध में रूस की जरूरत नहीं है। जबकि भारत रूस की जगह रक्षा सौदे के लिए विकसित देशों को अहमियत दे रहा है। ऐसे में रूस पाकिस्तान, रूस और ईरान के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिशों में जुटा है। इसी का परिणाम है कि रूस एक ओर चीन से मिल कर क्वाड को संतुलित करने के लिए नया मंच बनाने के लिए तत्पर है वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान में निर्णायक की भूमिका हासिल करने की महत्वाकांक्षा भी पाले हुए है।
रूस को भारत की ज्यादा जरूरत
पूर्व विदेश सचिव शशांक का मानना है कि आर्थिक मोर्चे पर मदद के लिए रूस को पाकिस्तान की तुलना में भारत की ज्यादा जरूरत है। भारत के पास बड़ा रक्षा सौदा करने के साथ तत्काल भुगतान करने की भी क्षमता है। जबकि पाकिस्तान आर्थिक रूप से ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं है। बकौल शशांक चूंकि भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताएं बदल रही हैं। जल्द ही अमेरिका और यूरोप के कई मंत्री भारत दौरे पर आएंगे। इसके बाद ही तय होगा कि भारत के भविष्य के कूटनीतिक एजेंडे में रूस का कैसा और कितना महत्व रहेगा।