जंगल की जमीन का गैर-वन उपयोग हुआ तो एक साल में वापस लें राज्य सरकारें- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाकर यह जांच करें कि क्या आरक्षित वन भूमि को किसी निजी व्यक्ति या संस्था को गैर-वन कार्यों के लिए दिया गया है। मामले में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने निर्देश दिया कि ऐसी जमीनें वापस लेकर वन विभाग को सौंपी जाएं। अगर किसी वजह से जमीन वापस लेना जनहित में न हो, तो संबंधित व्यक्ति या संस्था से जमीन की लागत वसूलकर उस धन का उपयोग वन विकास में किया जाए।
कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को एक साल के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा कि आरक्षित वन भूमि का इस्तेमाल केवल वनीकरण (अफॉरेस्टेशन) के लिए होना चाहिए। बता दें कि यह फैसला पुणे की एक आरक्षित वन भूमि के मामले में आया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि यह केस इस बात का उदाहरण है कि किस तरह नेताओं, अफसरों और बिल्डरों की मिलीभगत से कीमती जंगल की जमीन को पिछड़े वर्ग के लोगों के पुनर्वास के नाम पर व्यावसायिक उपयोग में ला दिया गया।
हिरासत में मौत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को लगाई फटकार, सीबीआई को सौंपा केस
सुप्रीम कोर्ट ने देवा पारधी (24) की हिरासत में हुई मौत के मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर मध्य प्रदेश सरकार को फटकार लगाई और जांच सीबीआई को सौंप दी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने आदेश दिया कि दोषी पुलिसकर्मियों को एक महीने के भीतर गिरफ्तार किया जाए और जांच गिरफ्तारी के 90 दिनों के भीतर पूरी की जाए। मामला चोरी के एक आरोप में देवा और उसके चाचा गंगाराम की गिरफ्तारी से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया कि पुलिस ने देवा को बेरहमी से प्रताड़ित करके मार डाला, जबकि पुलिस का दावा था कि उसे दिल का दौरा पड़ा था। गंगाराम घटना के एकमात्र गवाह हैं। वे अभी भी जेल में बंद हैं। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि दो पुलिस अधिकारियों को पुलिस लाइन भेज दिया गया है, लेकिन कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के बावजूद अभी तक किसी भी अधिकारी को गिरफ्तार नहीं किया गया है।