फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

देवघर हादसा: सुरक्षित बचाए गए लोगों ने भारतीय सेना को सराहा, बोले- जवानों को देखते ही टूटती उम्मीद फिर से बंधने लगी

आशीष तिवारी
Updated Wed, 13 Apr 2022 05:43 PM IST

सार

देवघर हादसे में 48 घंटे तक हवा में लटके रहे लोगों से अमर उजाला डॉट कॉम ने बातचीत की। फंसे हुए लोगों ने कहा कि सेना भगवान बनकर आई। उनका जितना भी शुक्रिया अदा किया जाए कम ही है।
विज्ञापन
विज्ञापन
देवघर रोपवे हादसा - फोटो : सोशल मीडिया


अपने परिवार वालों के साथ रोपवे में बैठे कक्षा चार में पढ़ने वाले कर्तव्य ने तो सेना की जमकर तारीफ की। कर्तव्य ने बताया कि जब रोपवे में फंस गए तो उनको कुछ समझ में ही नहीं आया कि यह हो क्या गया है। अचानक ट्राली में बैठे लोग चीख-पुकार करने लगे। कर्तव्य कहते हैं यह सब सुनकर उनको डर लगा कि पता नहीं अब क्या होगा। कर्तव्य ने बताया कि उनकी ट्रॉली में उनके साथ में मम्मी और पापा और दो रिश्तेदार भी थे। कर्तव्य को सेना के जवानों ने जब रेस्क्यू किया, तो वह उनसे लिपट गया। 


कर्तव्य कहते हैं कि वह बहुत डरे हुए थे लेकिन जैसे ही सेना आई और उसने लोगों को निकालना शुरू किया तो उसको लगा कि अब हमारी सेना हमको बचा लेगी। कर्तव्य कहते हैं कि सेना के जवानों ने जब उनको ऊपर खींचा तो उनको मजा आ गया। हालांकि वह बहुत डरे हुए थे। वह कहते हैं इंडियन आर्मी सबसे अच्छी है।


ऐसी एक ट्राली में सवार और 48 घंटे तक फंसे रहने वाले धर्मेंद्र कहते हैं उनको बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। लेकिन जिस तरीके से सेना ने ऑपरेशन करना शुरू किया और लोगों को बचाना शुरू किया, उससे उम्मीद है जाग गई कि अब उनको बचा लिया जाएगा। धर्मेंद्र ने आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन की पूरी लापरवाही के चलते ही यह घटना घटित हुई। वो कहते हैं कि जब रोपवे की व्यवस्था है तो उसके मेंटेनेंस की व्यवस्था भी होनी चाहिए। वह कहते हैं कि पूरे देश के अलग-अलग इलाकों में न जाने कहां-कहां रोपवे चलते हैं लेकिन उनका मेंटेनेंस कैसा है इसकी समय-समय पर जांच क्यों नहीं की जाती है। धर्मेंद्र कहते हैं कि सेना और एनडीआरएफ ने जिस तरीके से आपदा राहत का कार्य किया है वह सैल्यूट करने वाला है।  


बिहार के जमशेदपुर इलाके में रहने वाले सुमित अपने माता-पिता के साथ ट्रॉली में फंसे हुए थे। वो कहते हैं कि उनको सेना पर गर्व क्यों ना हो। सुमित के मुताबिक जैसे ही उनको रेस्क्यू किया जाने लगा तो सेना की ओर से संदेश दिया गया कि सबसे पहले प्राथमिकता में उनके मम्मी और पापा को बाहर किया जाएगा। वह कहते हैं कि उनके लिए इससे ज्यादा गर्व की बात कुछ नहीं थी कि सेना की प्राथमिकता में वरिष्ठ नागरिक थे। वो कहते हैं कि उनको खाने पीने की जरूर दिक्कत रही लेकिन उनके लिए खाने पीने से ज्यादा अपनी जान बचानी प्राथमिकता में था। सुमित के कहते हैं कि बचाव कार्य में लगी सेना और सभी एजेंसियों ने जिस तरीके से फंसे हुए लोगों को अपनी जान की बाजी लगाकर बचाया है वह प्रयास और अभियान गर्व से सीने को चौड़ा कर देता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next