तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में 21 मई 1991 को चुनावी रैली में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के वक्त एजी पेरारिवलन उर्फ अरिवु की उम्र 19 साल थी। पुलिस ने उसे राजीव की हत्या में इस्तेमाल होने वाले बम बनाने के लिए दो बैटरी देने और इस साजिश के लिए गलत पते से मोटरसाइकिल खरीदवाने के आरोप में गिरफ्तार किया था। 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिल कवि कुयिलदासन के बेटे पेरारिवलन समेत 26 लोगों को मौत की सजा सुनाई।
पेरारिवलन की सजा को बाद में उम्रकैद में बदला गया और बुधवार को जब वह रिहा हुआ तो उसकी उम्र 50 साल थी। सुप्रीम कोर्ट ने उसे रिहा करने के फैसले में जिन बिंदुओं को मुख्य आधार बनाया, उनमें गवर्नर के रवैये और दया याचिका को लंबे समय तक लंबित रखने के अलावा पेरारिवलन का सजा के दौरान सकारात्मक रवैया प्रमुख है। पेरारिवलन ने जेल की कालकोठरी में जिस तरह सजा काटी, वह उसे दूसरा मौका देने और समाज में वापस लौटने के लिए शीर्ष अदालत को पर्याप्त जान पड़ा।
जेल में रहते परास्नातक तक पढ़ाई आठ से अधिक डिप्लोमा भी किए
पेरारिवलन ने जेल की कालकोठरी से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) से पहले स्नातक किया और फिर परास्नातक पूरा किया। इसके अलावा उसने आठ से अधिक डिप्लोमा व सर्टिफिकेट कोर्स भी किए।
फांसी के तख्ते तक पहुंचकर लौट आया
सुप्रीम कोर्ट से 1999 में मौत की सजा मिलने के बाद उसने 2001 में अपनी दया याचिका राष्ट्रपति के पास भेजी। 11 साल बाद राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उसे खारिज कर दिया। इसके बाद 9 सितंबर 2011 को फांसी का दिन तय हुआ। उसकी मां को शव लेने आने के लिए पत्र भी गया। लेकिन फांसी से ठीक पहले तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें दोषियों की मौत की सजा कम करने की मांग की। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने फांसी के आदेश पर रोक लगा दी।
2013 में सीबीआई अफसर का खुलासा, उन्होंने बदला कुबूलनामा
2013 में सीबीआई के अधिकारी टी त्यागराजन ने खुलासा किया कि उन्होंने पेरारिवलन का कबूलनामा बदल दिया था। दरअसल, पेरारिवलन को नहीं पता था कि उसकी बैटरी का इस्तेमाल राजीव गांधी की हत्या के लिए बम बनाने में किया जाएगा। सीबीआई अधिकारी ने कोर्ट में हलफनामा भी दाखिल किया।
फिर सुप्रीम कोर्ट ने सजा उम्रकैद में बदल दी
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस टीएस थॉमस ने 2013 में कहा, 23 साल जेल में रखने के बाद किसी को फांसी देना सही नहीं होगा। यह एक अपराध के लिए दो सजा देने जैसा है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।
2014 में राज्यपाल के पास पहुंची दया याचिका
पेरारिवलन ने 2014 में तमिलनाडु के राज्यपाल के पास दया याचिका दायर की। जो पिछले 7 सालों से लंबित थी। 2018 में प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल ने इस पर राज्यपाल को अपनी सिफारिश दी और पेरारिवलन की उम्रकैद पूरी होने से पहले उसे रिहा करने की मांग की। उसे भी ढाई साल तक लटकाने के बाद राज्यपाल ने राष्ट्रपति के पास भेज दिया। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए पेरारिवलन को रिहा कर दिया।