आर्ट आफ लिविंग के विश्व सांस्कृतिक उत्सव के आयोजन और उस पर उठे विवाद में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी के फैसले की आलोचना हो रही है। मैं इस तरह के किसी भी समारोह के आयोजन से सहमति नहीं रखता हूं। व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि इस तरह का आयोजन होना ही नहीं चाहिए था। यह एक निजी समारोह था मगर इसके आयोजन में जिस तरह सरकारी महकमा जुड़ गया, वो ठीक बात नहीं है।
सबसे पहले तो इस तरह के आयोजन की इजाजत दी ही नहीं जानी चाहिए थी क्योंकि पिछले साल ही एनजीटी ने वर्ष 2015 में यमुना के किनारे पर किसी भी तरह के आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया था।
अति तो तब हो गई जब एक निजी संस्था ने डंके की चोट पर प्रतिबंध के बावजूद यमुना के किनारे इस तरह के समारोह का आयोजन किया। यमुना के तट पर तो सरकारी महकमे को भी किसी भी तरह का आयोजन करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए।
वैसे तो इस तरह के आयोजन का संज्ञान लेने के लिए एनजीटी ही सक्षम है क्योंकि यह उसके आदेश की अवहेलना है। वह इस बारे में खुद ही फैसला ले सकती है। मगर इस प्रतिबंध को लागू करने का सबसे बड़ा दायित्व है दिल्ली की सरकार का।
अफसोस इस बात का है कि दिल्ली की सरकार यमुना के किनारे हुए इस आयोजन का विरोध करने की बजाय कार्यक्रम के प्रायोजकों में से एक बन गई। दिल्ली सरकार के महकमे जैसे डीडीए, नगर पालिका, जिन पर एनजीटी के फैसले को लागू करने की जिम्मेदारी थी - उन्होंने विरोध नहीं किया।