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उत्तर भारतीयों के प्रति नरम पड़े राज ठाकरे के तेवर, उत्तर प्रदेश और बिहार का मुद्दा छोड़ा

Sat, 12 Oct 2019 10:30 PM IST
आसिम खान डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
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राज ठाकरे (फाइल फोटो)
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महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय विरोध की राजनीति करने वाले राज ठाकरे के तेवर अब ढीले पड़ गए हैं। बीते 10 साल से उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगलने वाले राज ठाकरे इस बार खुलकर उत्तर भारतीयों के खिलाफ बोलने से बचते दिखाई दे रहे हैं। इस चुनाव में वह सिर्फ विपक्ष का नेता बनाने के लिए जरूरी सीट पाना चाहते हैं। राज ठाकरे ने अब तक महाराष्ट्र में तीन जनसभाएं की हैं लेकिन उन जनसभाओं में उत्तर भारतीयों को निशाना बनाने से परहेज किया है। 

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शुक्रवार को मुंबई के घाटकोपर में एक जनसभा में उत्तर भारतीयों को कोसने के बाजय सिर्फ इतना कहा कि उत्तर भारत से रोज 48 ट्रेन आती हैं इससे भूमिपुत्र परेशानी झेल रहा है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट तौर पर यूपी और बिहार के लोगों का नाम नहीं लिया और न ही उन्हें निशाने पर लिया। इस बार विधानसभा चुनाव में मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे अपनी चुनावी रैलियों में जनता से यही कह रहे हैं कि मनसे को इतनी सीटो पर जिता दें जिससे कि विपक्ष के नेता पद उनकी पार्टी को मिल सके।

एकमात्र विधायक ने भी छोड़ा साथ
दरअसल, राज ठाकरे को अपनी राजनितिक हैसियत का बखूबी अंदाजा है। साल 2014 के विधानसभा चुनाव में मात्र एक सीट पर जीत मिलने के बाद मनसे के दुर्दिन शुरू हो गए। वह भी पुणे के पास जिस जुन्नर सीट से मनसे के शरद सोनावणे ने जीत हासिल की थी उन्होंने मनसे को बाय-बाय कह शिवसेना का शिवबंधन बांध लिया है। शिवसेना ने शरद को जुन्नर सीट से उम्मीदवारी भी दे दी है। इस तरह उनका एकमात्र विधायक भी साथ छोड़ चुका है। 
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साल 2017 के मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव में मनसे के सात पार्षद चुने गए थे जिसमें से छह शिवसेना में शामिल हो चुके हैं। इस राजनीतिक परिस्थिति में राज ठाकरे 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी खड़ा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। हालांकि उन्होंने कांग्रेस एनसीपी के समर्थन में कई धुआंधार रैलियां कीं। जनता भी उन्हें सुनने पहुंची, लेकिन उनके तूफानी प्रचार के बावजूद कांग्रेस-एनसीपी की लुटिया डूब गई। 

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज एक सीट तो एनसीपी को मात्र तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा। देखने वाली बात यह रही कि इस चुनाव में मावल से पवार परिवार की तीसरी पीढ़ी और पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बेटे पार्थ पवार को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा।

नहीं पूरी हुई गठबंधन की मुराद
विधानसभा चुनाव में राज ठाकरे कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन कर अपनी राजनीतिक हैसियत में इजाफा करना चाहते थे लेकिन, कांग्रेस ने मुराद पूरी नहीं होने दी। हालांकि उन्होंने किसी तरह अकेले चुनाव मैदान में उतरने की हिम्मत जुटाई है लेकिन, राह आसान नहीं लग रही है। दरअसल, महाराष्ट्र की मराठी जनता भी भाषा या प्रांतवादी राजनैतिक विचारधारा की समर्थक नहीं रही है। 

सूबे की जनता यह मानती है कि भारत का संविधान महाराष्ट्र के ही सपूत बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर ने लिखा है जिन्होंने देश के हर नागरिक को देश मे कहीं भी रहने और रोजगार प्राप्त करने का अधिकार दिया है। इसलिए खासकर महाराष्ट्र की दलित जनता जो डॉ आंबेडकर को भगवान मानती है वह राज ठाकरे के इस नकारात्मक सोच की विरोधी है। इसलिए साल 2009 में एक बार राज ठाकरे को मराठी मुद्दे का लाभ मिला लेकिन, उसके बाद जनता ने उन्हें तवज्जो नहीं दी।.

बाल ठाकरे ने भी छोड़ दिया था मराठी मुद्दा
दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भी मराठी मुद्दा छेड़ा था लेकिन एक समय के बाद ठाकरे ने भी हिंदुत्व की विचारधारा को आत्मसात कर अपनी राजनीति को नया मोड़ दे दिया था। उन्होंने मुंबई में मद्रासियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा लेकिन, जल्द ही हिंदुत्व की राजनीति करने लगे। साल 1984 के सिख दंगे में बाल ठाकरे ने मुंबई में सिखों पर आंच नहीं आने दी। वहीं से 1993 के बाबरी विध्वंस के बाद मुंबई में हुए दंगे में बाल ठाकरे ने हिंदुत्व का खुलकर समर्थन किया।

ईवीएम पर भी फेल हुए राज ठाकरे
लोकसभा चुनाव के बाद राज ठाकरे ने ईवीएम के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश की। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी मिले लेकिन, उनकी इस मुहिम रंग नहीं लाई। विपक्ष का साथ नहीं मिलने से भी राज ठाकरे को निराशा हाथ लगी।

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