विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर (फाइल)
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पांच देशों का दृष्टिकोण अदूरदर्शी है, इस कारण लंबे समय से लंबित सुधार अटका पड़ा है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी कोई पश्चिमी देश नहीं। जयशंकर के इस बयान को चीन के परोक्ष संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है। विदेश मंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में बदलाव की भावनाएं मजबूती से सामने आ रही हैं, लेकिन कुछ हिस्से इस पर सहमत नहीं हो रहे। उनकी सहमति हासिल करना चुनौतीपूर्ण है।
जयशंकर ने देशों की बुद्धिमत्ता पर की तीखी टिप्पणी
विदेश मंत्री ने कहा, अगर आप सुरक्षा परिषद में शामिल देशों (पांच स्थायी सदस्यों से) पूछेंगे कि आपकी शक्तियां कम होंगी, तो उनकी प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाना कठिन नहीं। डॉ जयशंकर ने कहा, अगर ये देश बुद्धिमान हैं, तो इनका उत्तर कुछ और होगा। हालांकि, अगर वे अदूरदर्शी हैं, तो उत्तर वही होगा जो आज है। बता दें कि UNSC में पांच स्थायी सदस्य रूस, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस और अमेरिका हैं। इनके पास किसी भी देश की तरफ से पेश किए गए ठोस प्रस्ताव पर वीटो करने का अधिकार है।
स्थायी सदस्यता के प्रबल दावेदारों में भारत के अलावा कौन देश शामिल
गौरतलब है कि बड़ी शक्तियों के टकराव के कारण बदलते भू-राजनीतिक समीकरण और समसामयिक वैश्विक वास्तविकता का हवाला देकर UNSC में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की मांग जोर पकड़ रही है। भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी और जापान यूएनएससी की स्थायी सदस्यता के प्रबल दावेदार हैं। यूएनएससी की प्राथमिक जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना है।
दो हिंसक संघर्षों के बीच UNSC की भूमिका पर सवाल
हाल ही में इस्राइल और हमास के हिंसक संघर्ष की विभीषिका को देखते हुए यूएनएससी में तत्काल युद्धविराम की अपील के साथ प्रस्ताव पेश किया गया था। हालांकि, अमेरिका ने इस पर वीटो कर दिया, जिस कारण यह प्रस्ताव यूएनएससी से पारित नहीं कराया जा सका। बता दें कि पश्चिम एशिया में जारी हिंसक संघर्ष में अब तक 29 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इससे पहले रूस और यूक्रेन के बीच शुरू हुए युद्ध के समय भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग जोर पकड़ने लगी थी।