इस पर दिल्ली अर्बन आर्ट की तरफ से कहा गया कि 'अधिकांश शहरों का मामूली सी बारिश में जलमग्न हो जाने का पहला बड़ा कारण गलत अर्बन प्लानिंग है। प्लानिंग में अक्सर इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि जमीन कैसी है और किस काम की है। दूसरी बात यह समझनी होगी कि आप निकायों की क्षमता बढ़ाए बिना किसी योजना को सफलता से लागू नहीं कर सकते। यही वजह है कि हम दशकों के विकास के बाद भी इस समस्या से निपट नहीं पाए हैं।'
दरअसल इस गलत अर्बन प्लानिंग में शहरों की जमीनी सतह का लगातार कंक्रीट से ढंका जाना भी शामिल है। इसे समझाते हुए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट की हाइड्रो-मैटेरोलॉजी डिवीजन के आशुतोष देव कौशिक कहते हैं कि 'टाइल से जमीन ढंकती जा रही है। इससे पानी जमीन में रिसने के बजाए बहकर तेजी से निचले इलाकों में भरने लगता है।
वैसे इस सीमेंट और कंक्रीटीकरण को वे रोजगार व शिक्षा के लिए शहरों की तरफ हो रहे पलायन से जोड़ते हैं। वे बताते हैं बड़ी आबादी लगातार शहरों की ओर माइग्रेट हो रही है। इन्हें जहां खाली जगह मिल रही है, वहीं बस रहे हैं और ऐसी खाली जगह आमतौर पर शहरों में निचले इलाके ही होते हैं। अक्सर यह या तो नदी का बाढ़ क्षेत्र होता है या अन्य डूब क्षेत्र।'
इधर, दिल्ली स्थित स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर ने इसके पीछे एक आर्थिक पक्ष होना बताया। 'अर्बन प्लानिंग के सिद्धांतों के मुताबिक निचले इलाकों में पहले मिट्टी का भराव करना चाहिए फिर मकान या अन्य निर्माण होने चाहिए। मगर ऐसा करने में निर्माण लागत बढ़ जाती है। यही वजह है कि कई शहरों में इन सिद्धांतों को ताक पर रखकर निर्माण हो गए हैं।' यानी जानकारों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से यही कहना है कि यह समस्या मानव-निर्मित है।
मध्यप्रदेश टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की तरफ से कहा गया कि- 'किसी समय हर शहर का नेचुरल ड्रेनेज सिस्टम नालों के रूप में हुआ करता था। मगर नई बसाहट ने इसे खत्म कर दिया। 10 फीट चौड़ाई-गहराई वाले नाले खत्म कर दिए और उनकी जगह एक फीट व्यास की पाइप लाइन बिछा दी गई हैं। यह लाइन तीन-चार इंच बारिश का पानी भी आसानी से नहीं निकाल पाती। यह तो समस्या है, लेकिन दशकों से समस्या हल इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि अधिकांश शहरों में नया ड्रेनेज और स्टॉर्म वाटर लाइन सिस्टम भी जरूरत के मुताबिक नहीं बना।
समाधान क्या है?
'शुरुआत में स्मार्ट सिटीज भी नहीं दे पाएंगी हल'
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स ने कहा कि स्मार्ट सिटी शुरुआत में शहर के दो से पांच फीसदी हिस्से पर ही बन रही हैं। ऐसे में हो सकता है कि स्मार्ट सिटी के लिए चुना गया क्षेत्र तो सुरक्षित रहे, लेकिन उसके बाहर समस्याएं ऐसी ही हों। भविष्य में इसके हल के लिए हमें चीन के तरीकों को अपनाना होगा। वहां जो गांव या क्षेत्र, शहर बनने की क्षमता रखते हैं, वहां अगले 20 वर्ष की आवश्यकता के अनुसार इंफ्रास्ट्रक्चर और जरूरी आवश्यकता विकसित की जाती है। इसके बाद आबादी बसाई जाती है।
...तो फिर हल क्या है?
ज्यादातर एक्सपर्ट हर साल बारिश में एक-सी ही समस्या से उबरने का हल क्षेत्र या शहर की आबादी के हिसाब से ड्रेनेज व स्टॉर्म वाटर लाइन डालना बताते हैं। वे कहते हैं इसके लिए सबसे पहले नेचुरल ड्रेनेज सिस्टम को रिवाइव करना होगा। कुछ जानकारों का कहना है कि इसका हल बहुत खर्चीला है। इसके लिए हम या तो निचले इलाकों की पहचान कर उन्हें ऐसा स्वरूप दें कि दूसरे इलाकों का पानी यहां जमा न हो। दूसरा तरीका यह है कि ऐसे इलाकों में ग्राउंड वाटर रिचार्जिंग की जाए।