कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने फॉर्म-6 को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा एक पोस्ट में पूछा है कि फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर आदेश किसने दिया? सोशल मीडिया पर साझा पोस्ट में राहुल गांधी ने लिखा है कि फॉर्म-6 में गैरकानूनी तरीके से बदलाव किया गया। चुनाव आयोग के आयुक्तों ने भी इस पर आपत्ति जताई है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में क्या लिखा?
राहुल गांधी ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज को लेकर भी सवाल उठाया। राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में कहा, 'चुनाव आयोग में किसने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज को यह बदलाव करने का आदेश दिया? टीसीएस में किसने इस पर हस्ताक्षर किए? क्या ऐसा करने के लिए टीसीएस पर दबाव डाला गया था?'
कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने दावा किया कि फॉर्म-6 में यह बदलाव 'पीएम-एचएम की जोड़ी' द्वारा कराया गया था। राहुल गांधी की पोस्ट को टैग करते हुए रमेश ने कहा, 'फॉर्म-6 में बदलाव जुलाई 2026 के मध्य में मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा असंवैधानिक तरीके से किए गए, ताकि जेन-जी के मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाया जा सके। साफ तौर पर यह कदम पीएम-एचएम की जोड़ी द्वारा कराया गया था।'
राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब विपक्षी इंडिया गठबंधन ने सभी जिलों में लोकतंत्र बचाओ मार्च शुरू करने का फैसला किया है। विपक्ष की मांग है कि भविष्य में बैलेट पेपर से चुनाव हों। साथ ही सुप्रीम कोर्ट से भी विपक्ष ने अपील की है कि एसआईआर से जुड़े मामलों पर जल्द सुनवाई करे।
चुनाव आयोग ने फॉर्म-6 में किया बड़ा बदलाव
गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया पूरी कर चुके राज्यों में फॉर्म-6 में बड़ा बदलाव किया है। इस बदलाव के तहत अब एसआईआर में नाम कटने के बाद दोबारा नाम जुड़वाने के लिए 2003 की वोटर लिस्ट की जानकारी नहीं देनी होगी। अब आवेदक को ये बताने की जरूरत नहीं होगी कि उसके माता-पिता, दादा-दादी का नाम 2003 की लिस्ट में था या नहीं।
बुधवार को जारी चुनाव आयोग के आदेश में कहा गया है जहां मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है , वहां चुनाव आयोग ने फॉर्म-6 से जुड़ी घोषणा को वापस ले लिया गया है। इसका मतलब है कि अब जिन राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया होनी है, उनमें आवेदकों को सिर्फ नियमित फॉर्म-6 जमा करना होगा।
क्या है विवाद?
यह पूरा विवाद द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के कुछ दिन बाद शुरू हुआ, जिसमें कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में एसआईआर से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों का कहना था कि ये फैसले उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना जारी किए गए थे। एसआईआर प्रक्रिया को लेकर अपने ही दो आयुक्तों द्वारा उठाए गए सवालों के बीच चुनाव आयोग ने कहा है कि किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग मत और टिप्पणियां होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने कहा कि उसके सभी आदेशों को पूर्ण कानूनी मान्यता प्राप्त है और वे स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप लिए गए।