कृषि आंदोलनों की लंबी मार झेलने के बाद पंजाब एक और बड़े कृषि संकट की ओर बढ़ रहा है। राज्य के अन्न भंडार गृह अभी भी अनाज से भरे हुए हैं। नया अनाज रखने की जगह नहीं है। इसका सीधा असर फसलों की नई खरीदी पर पड़ रहा है। सरकार चाहकर भी नई फसलों की खरीद नहीं कर पा रही है। चावल मिलें भी नई फसलों की खरीद नहीं कर रही हैं। ऐसे में किसानों के सामने नई फसल को बेचने/रखने का संकट पैदा हो गया है। यह स्थिति पूरे पंजाब की है। सरकार या एफसीआई के पास अब इतना समय भी नहीं है कि वे गोदामों को रिक्त करने का काम कर सकें। ऐसे में पंजाब में एक अभूतपूर्व संकट पैदा होता दिखाई दे रहा है जिसका समाधान फिलहाल किसी के पास नहीं है।
पंजाब में प्रति वर्ष लगभग 180-185 लाख मीट्रिक टन चावल की पैदावार होती है। इस बार भी धान की अच्छी पैदावार हुई है। अनुमान है कि इस बार भी पंजाब के किसान 185-190 लाख मीट्रिक टन चावल बेचने के लिए बाजार में लेकर आएंगे। पंजाब से हुई कुल खरीदी का 99 फीसदी चावल केंद्र सरकार पीडीएस के माध्यम से गरीब लोगों में मुफ्त प्रधानमंत्री राशन योजनाओं के अंतर्गत वितरित करती है।
गोदामों में अनाज ठसाठस भरा हुआ है। नया अनाज रखने के लिए जगह नहीं है। इस स्थिति को भांपते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर गोदामों को समय से खाली करने का अनुरोध किया था। दावा किया गया था कि केंद्र 31 मार्च तक गोदामों में चावल रखने के लिए पर्याप्त जगह बना देगा। लेकिन गोदामों अब तक भी रिक्त नहीं किया जा सका है। अब केंद्र सरकार, राज्य सरकार और किसानों के सामने नई फसल को लेकर बड़ा संकट पैदा हो गया है।
रखने के लिए स्थान न होने के कारण सरकार नई फसल की खरीदी नहीं कर रही है। हर साल एक अक्टूबर से धान की फसल की खरीदी का सीजन शुरू हो जाता है। लेकिन अब तक 15 दिनों के बीच केवल पांच लाख मीट्रिक टन चावल की खरीद हुई है।
आरोप यह भी है कि इस स्थिति का लाभ उठाकर आढ़तिए किसानों की फसल औने-पोने दामों पर खरीद रहे हैं। इसका सीधा नुकसान चावल उत्पादक किसानों को हो रहा है। बीज-खाद का कर्ज चुकाने के लिए उन्हें पैसा चाहिए, कर्ज चुकाने के लिए पैसा जुटाने के लिए उन्हें अपनी फसल आढ़तियों की मनमर्जी के दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। किसान इसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकार और एफसीआई को जिम्मेदार बता रहे हैं। इस स्थिति के लिए वे एफसीआई के अधिकारियों और आढ़तियों के बीच सांठगांठ होने का आरोप भी लगा रहे हैं।
क्यों पैदा हुई ये स्थिति?
कृषि मामलों के विशेषज्ञ विजय सरदाना ने अमर उजाला से कहा कि इस स्थिति के लिए केंद्र सरकार की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं। पहले यूक्रेन संकट को देखते हुए सरकार ने अनुमान लगाया था कि यदि निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया तो देश में चावल उपलब्धता का संकट पैदा हो सकता है। महंगाई न बढ़े, इसे ध्यान में रखते हुए निजी व्यापारियों को भी चावल का भंडार करने पर रोक लगा दी गई।
इसका असर यह हुआ कि एक तरफ तो चावल का निर्यात रुक गया। निर्यात न होने के कारण निजी कंपनियों ने भी चावल की खरीद करना बंद कर दिया। दुकानदारों-कंपनियों को भी स्टॉक करने की अनुमति नहीं थी, लिहाजा उन्होंने भी धान की खरीदी बंद कर दी। बिना पूरी स्थिति को समझे प्रतिबंध लगाने का असर हुआ कि गोदामों में धान-चावल पड़ा का पड़ा रह गया। अब सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि इस स्थिति से कैसे निबटें। गोदामों में पुराना चावल पड़ा है और किसानों के पास नया धान-चावल भरा पड़ा है। इसे खरीदने वाला कोई नहीं है।
यदि केंद्र सरकार उपलब्ध चावल, देश में खपत की सही स्थिति का आकलन कर पाती और घरेलू उपभोग की सुरक्षित सीमा से अधिक चावल के निर्यात को खुली छूट देती तो आज इस तरह की स्थिति पैदा न होती।
फसलों को बदलें किसान
विजय सरदाना ने कहा कि धान को एमएसपी देने का सीधा नकारात्मक असर यह हुआ है कि किसान अधिक से अधिक धान की फसल पैदा करने में जुट गए हैं। धान के खेतों में बहुत अधिक पानी लगता है। खाद, उर्वरक और रसायनों का भी भारी मात्रा में उपयोग होता है। इससे पंजाब की धरती के नीचे पानी की कमी हो गई है। पानी का लेवल बहुत नीचे चला गया है। उर्वरकों के भारी प्रयोग से यहां का वातावरण दूषित हो गया है। पंजाब में इस समय कैंसर मरीजों की संख्या पूरे देश में सबसे ज्यादा है। इसका सीधा असर गेहूं-धान की फसलों में भारी उर्वरकों के प्रयोग को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
यदि किसान केवल धान-गेहूं की बजाय अन्य फसलों को पैदा करते तो इस तरह केवल धान बेचने की मजबूरी उनके सामने न होती। अलग-अलग फसलें पैदा करने से मिट्टी स्वस्थ होती। इससे उन्हें भी लाभ होता और उपभोक्ताओं को भी अलग-अलग चीजें सही मूल्य पर मिल पातीं। लेकिन गलत प्राथमिकता की नीति आज किसानों पर भारी पड़ रही है।
फसलों का मूल्य निर्धारित करे सरकार
किसान नेता सरदार वीएम सिंह ने अमर उजाला से कहा कि धान की फसलों के लिए एमएसपी न देना इस समस्या की जड़ है। यदि सरकार केवल एक कानून पारित कर दे कि धान की फसल को एक निश्चित कीमत से कम पर कहीं भी खरीदा-बेचा नहीं जा सकता तो निजी क्षेत्र हो या सार्वजनिक, सबके लिए उसी मूल्य पर धान की खरीद करना अनिवार्य हो जाता। तब किसानों को भी खुले बाजार में उचित मूल्य मिलता। पूरी फसल खरीदने की जिम्मेदारी सरकार पर नहीं रखनी चाहिए, लेकिन खुले बाजार में भी चावल की कीमत एक निश्चित दर से कम पर न की जा सके, इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे किसान खुले बाजार में अपनी फसल बेच पाता और आज धान को रखने का संकट पैदा न होता।
सरदार वीएम सिंह ने कहा कि आज भी छत्तीसगढ़ इसी तरह के मॉडल पर काम कर रहा है। वहां एक निश्चित मूल्य पर ही चावल की खरीद-बिक्री की जा रही है। हरियाणा ने भी 24 फसलों को एमएसपी पर खरीदने की घोषणा कर दी है। इसी तरह का मॉडल पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए।
कांग्रेस ने आरोप लगाया
पंजाब में नेता विपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया है कि राज्य की भगवंत मान सरकार इस समस्या को सुलझाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं कर रही है। वह केवल केंद्र सरकार को पत्र लिख देने को अपना कर्तव्य पूरा करना समझ रही है। लेकिन इससे किसानों की समस्या हल नहीं हो रही है और किसानों के सामने गंभीर आर्थिक संकट पैदा हो गया है।
कांग्रेस नेता ने पीआर-126 और इसी तरह की धान की किस्मों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री मान के कहने पर किसानों ने इन नई फसलों को बोया था। उन्होंने कहा कि अब यह बात सामने आई है कि इस किस्म से मिलिंग के बाद पारंपरिक किस्मों के मुकाबले प्रति क्विंटल करीब पांच किलो कम चावल मिल रहा है। इससे चावल मिल मालिकों को इस फसल की खरीद पर करोड़ों का नुकसान होगा। मिल मालिक अब इस फसल की खरीद नहीं कर रहे हैं।
समस्या बहुत गंभीर है। इसका कोई समाधान न केंद्र के पास है, न भगवंत मान सरकार के पास। लेकिन इसका नुकसान केवल किसानों को भुगतना पड़ रहा है। यह पंजाब में एक नए संकट को जन्म दे रहा है जिससे निपटना केंद्र-राज्य सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है।