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पंजाब में कैप्टन की कमी नहीं खलने दे रहे चन्नी: सिद्धू काबू में रहे तो नैया लगा सकते हैं पार

सार

पंजाब चुनाव में कांग्रेस पार्टी को चन्नी से उम्मीद है कि उनके बलबूते दलित आबादी (हिंदू और सिख दलित) जो कि 32 फीसदी हैं, उसका समर्थन मिल सकता है। पंजाब की कुल 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं। पंजाब की आबादी तीन करोड़ के पार हो गई है...
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पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)
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विस्तार
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पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी विधानसभा चुनाव में पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह की कमी नहीं खलने दे रहे हैं। जिस बात के लिए राजनेता, नौकरशाह या जनता, कैप्टन से नाराज थी, चन्नी उसके विपरित हैं। ऐसा कहा जाता है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने राजशाही अंदाज के चलते पंजाब और पार्टी से दूर होते गए। नतीजा, चुनाव की दहलीज पर कांग्रेस पार्टी ने अमरिंदर सिंह से पीछा छुड़ा लिया। पंजाब यूनिवर्सिटी में मंच पर भंगड़ा, ढाबे पर चाय पीने के लिए रुकना, खुद की पुलिस सुरक्षा में कटौती और पीएम मोदी की सुरक्षा चूक मामले में उन्होंने जिस चतुराई से अपना पक्ष रखा, वह उनके आलोचकों को अंदर तक भेद गया। तीन चार माह में चन्नी ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि उन्होंने कैप्टन के जाने से खाली हुई जगह को भरने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। अब अगर चुनाव में नवजोत सिंह सिद्धू से तालमेल सही रहा, तो विरोधियों को कांटे की टक्कर दी जा सकती है।

काबू में नहीं सिद्धू

अमरिंदर सरकार में चन्नी तकनीकी शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। पिछले साल कैप्टन के त्यागपत्र देने के बाद चन्नी ने राज्य के 16वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। रूपनगर की चमकौर साहिब विधानसभा सीट से तीसरी बार विधायक चुन कर आए चन्नी प्रदेश के पहले दलित मुख्यमंत्री हैं। राजनीतिक जानकारों ने उनके लिए सीएम का पद, कांटों का ताज बताया था। भले ही नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस की जिम्मेदारी दे दी गई, लेकिन तंज से भरपूर उनकी बयानबाजी पर विराम नहीं लग सका। वे आम जनसभाओं और प्रेसवार्ता में खुलकर चन्नी और प्रदेश सरकार के खिलाफ बयान दे देते हैं। इससे पार्टी को नुकसान पहुंचता है तो वहीं विपक्षी दल खासतौर से आम आदमी पार्टी, उस बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी पर हमला बोल देती है।

सादगी पसंद हैं चन्नी

मंगलवार को एक प्रेसवार्ता में नवजोत सिंह सिद्धू से जब पूछा गया कि उनकी पार्टी ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया है तो उन्होंने कहा, पंजाब के लोग मुख्यमंत्री तय करते हैं। इसमें आलाकमान का कोई लेना-देना नहीं है। पिछले दिनों उन्होंने कई ऐसी बातें कहीं, जिससे चन्नी सरकार को जवाब देना भारी पड़ गया। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि चन्नी को सीएम का पद चुनाव की दहलीज पर मिला है। इसके बावजूद उनकी सादगी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर रही है। हालांकि उनके बारे में कहा जाता है कि जब वे मंत्री थे, तो भी बहुत सामान्य तरीके से लोगों से मिलते थे। कोई भी व्यक्ति उनके कार्यालय या आवास पर मिल सकता था। कांग्रेस हाईकमान को कैप्टन की जगह उन्हें सीएम बनाने के लिए ज्यादा माथापच्ची नहीं करनी पड़ी। कांग्रेस पार्टी में विरोधी धड़े भी उनके नाम पर सहमत हो गए।

किसान संगठनों करेंगे अकालियों का नुकसान

पंजाब चुनाव में कांग्रेस पार्टी को चन्नी से उम्मीद है कि उनके बलबूते दलित आबादी (हिंदू और सिख दलित) जो कि 32 फीसदी हैं, उसका समर्थन मिल सकता है। पंजाब की कुल 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं। पंजाब की आबादी तीन करोड़ के पार हो गई है। राज्य में अभी तक जट सिख ही मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। जट सिख की आबादी करीब 22 फीसदी बताई गई है। मौजूदा परिस्थितियों में चन्नी को सभी समुदायों का समर्थन हासिल है। किसान संगठनों के चुनाव में कूदने के कारण अकाली दल को ग्रामीण इलाकों में नुकसान उठाना पड़ सकता है। भले ही अकाली दल ने बसपा के साथ गठबंधन किया है, लेकिन कांग्रेस पार्टी को भरोसा है कि उसे दलित समुदाय का बड़ा समर्थन मिलेगा। मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने मालवा (दक्षिण-पूर्वी हिस्से) और माझा इलाके (अमृतसर, तरणतारण, गुरदासपुर व पठानकोट) पर खास ध्यान लगा रखा है। इन इलाकों में पंजाब की एक तिहाई दलित आबादी रहती है।

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कांग्रेस पार्टी के एक केंद्रीय नेता का कहना है कि पंजाब में चन्नी के लिए सीएम बनना, वाकई कांटों का ताज है। चूंकि ये वक्त ही ऐसा है। हालांकि चन्नी ने बहुत हद तक कैप्टन की कमी पूरी कर दी है। बाकी नेताओं के बीच कहासुनी चलती रहती है। उससे कोई बड़ा नुकसान नहीं होता। पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी व पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी, पंजाब कांग्रेस कमेटी के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं। सिद्धू को लेकर पार्टी गंभीर है। उन्हें कई बार दिल्ली बुलाया गया है। चुनावी रणनीति को लेकर उनसे बातचीत हुई है। हालांकि वे सार्वजनिक तौर पर ऐसी बयानबाजी कर देते हैं, जिससे पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। राहुल गांधी, जल्द ही पंजाब के नेताओं के साथ दिल्ली में बैठक करने जा रहे हैं। उसमें काफी हद तक मामले सुलझा लिए जाएंगे।

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