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प्रियंका गिरफ्तार, बाहर कांग्रेसी बेकरार: बेलछी और सीतापुर में कितनी समानता, क्या वे इंदिरा के स्टाइल की सियासत कर रहीं?

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Tue, 05 Oct 2021 02:05 PM IST

सार

प्रियंका गांधी को लखीमपुर खीरी जाते वक्त रविवार की दरमियानी रात सीतापुर में हिरासत में लेने के बाद अब गिरफ्तार कर लिया गया है। हिरासत में रखे जाने  पर प्रियंका ने गेस्ट हाऊस में सफाई करके गांधीगिरी भी दिखाई। बताया जा रहा है कि प्रियंका गांधी को जहां हिरासत में रखा गया था वहां ड्रोन से निगरानी की जा रही थी। प्रियंका के इस तेवर से कांग्रेसी खुश हैं कि उन्होंने अपने जोश से कार्यकर्ताओं में जान फूंक दी है।
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प्रियंका गांधी और इंदिरा गांधी - फोटो : Amar Ujala

पहली घटना
आपातकाल लागू होने के बाद देशवासियों के प्रतिशोध ने 1977 में इंदिरा गांधी को केंद्र की सत्ता से बेदखल कर दिया था। देश में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार चल रही थी। सरकार को बने नौ महीने हो गए थे। बिहार विधानसभा चुनाव होने वाले थे, तभी बिहार में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी। चुनाव से कुछ दिन पहले ही हथियारों से लैस कुर्मियों के गिरोह ने बेलछी गांव पर हमला बोल दिया।

यहां घंटों गोलीबारी हुई और 11 लोगों को जिंदा जला दिया गया। इस खबर देश भर में जंगल में लगी आग की तरह फैल गई। अब तक राजनीतिक उदासीनता झेल रहीं इंदिरा गांधी ने बेलछी गांव जाने का फैसला किया। सोनिया गांधी के बायोग्राफर जविएर मोरो ने अपनी किताब ‘दी रेड साड़ी’ में इस घटना के बारे में विस्तार से बताया है कि जब सोनिया गांधी को इंदिरा गांधी के बेलछी गांव जाने के कार्यक्रम के बारे में पता चला तो वे घबरा गईं।



उन्होंने अपनी सास को वहां जाने से मना किया। लेकिन इंदिरा गांधी नहीं मानीं। वे 13 अगस्त 1977 को तेज बारिश में बेलछी गांव पहुंच गईं। पहले वे फ्लाइट से पटना पहुंची। फिर जीप से बेलछी के लिए रवाना हुई लेकिन रास्ते में कीचड़ होने की वजह से जीप फंस गई तो ट्रैक्टर का इंतजाम किया गया।
 

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प्रियंका गांधी और इंदिरा गांधी - फोटो : Amar Ujala
पहली घटना
आपातकाल लागू होने के बाद देशवासियों के प्रतिशोध ने 1977 में इंदिरा गांधी को केंद्र की सत्ता से बेदखल कर दिया था। देश में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार चल रही थी। सरकार को बने नौ महीने हो गए थे। बिहार विधानसभा चुनाव होने वाले थे, तभी बिहार में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी। चुनाव से कुछ दिन पहले ही हथियारों से लैस कुर्मियों के गिरोह ने बेलछी गांव पर हमला बोल दिया।

यहां घंटों गोलीबारी हुई और 11 लोगों को जिंदा जला दिया गया। इस खबर देश भर में जंगल में लगी आग की तरह फैल गई। अब तक राजनीतिक उदासीनता झेल रहीं इंदिरा गांधी ने बेलछी गांव जाने का फैसला किया। सोनिया गांधी के बायोग्राफर जविएर मोरो ने अपनी किताब ‘दी रेड साड़ी’ में इस घटना के बारे में विस्तार से बताया है कि जब सोनिया गांधी को इंदिरा गांधी के बेलछी गांव जाने के कार्यक्रम के बारे में पता चला तो वे घबरा गईं।

उन्होंने अपनी सास को वहां जाने से मना किया। लेकिन इंदिरा गांधी नहीं मानीं। वे 13 अगस्त 1977 को तेज बारिश में बेलछी गांव पहुंच गईं। पहले वे फ्लाइट से पटना पहुंची। फिर जीप से बेलछी के लिए रवाना हुई लेकिन रास्ते में कीचड़ होने की वजह से जीप फंस गई तो ट्रैक्टर का इंतजाम किया गया।
 

सुर्खियों में थी हाथी की सवारी करतीं इंदिरा गांधी की तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया
स्थानीय लोगों के कहने पर हाथी पर चढ़ गईं
वरिष्ठ पत्रकार नलिनी सिंह की ननद प्रतिभा सिंह उस यात्रा में इंदिरा गांधी के साथ थीं। नलिनी सिंह बताती हैं कि रास्ते में बहुत कीचड़ था लेकिन इंदिरा गांधी ने जिद पकड़ी कि उन्हें आगे जाना है। इसलिए तब स्थानीय लोगों ने कहा कि आप हाथी पर चढ़ जाइए। हाथी पर कंबल रखकर उनके बैठने का इंतजाम किया गया और वे दोनों उस पर बैठकर चढ़कर बेलछी गांव में पीड़ितों से मिलने पहुंचीं।

इंदिरा का इस तरह हाथी पर बैठकर पीड़ितों से मिलने जाना राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बनी। इस घटना ने पूरे देश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया और 1980 में कांग्रेस ने केंद्र में जोरदार वापसी की।

अब बात प्रियंका की
जैसे ही प्रियंका को लखीमपुर खीरी कांड के बारे में पता चला वे रविवार को ही लखनऊ के लिए रवाना हो गई। वे रात में ही लखीमपुर जाने के लिए निकल गईं। एक तरफ प्रियंका लखीमपुर खीरी पहुंचने के लिए हर जतन करने में लगी थीं। बताया जाता है कि वे एक गाड़ी की पिछली सीट पर भी बैठ गई थीं और वे पुलिस को चकमा देती रहीं।

दूसरी तरफ कांग्रेस महासचिव को हिरासत में लेने के लिए परसों पूरी रात पुलिस इधर से उधर दौड़ती रही। पहले उन्हें लखनऊ में रोकने की कोशिश की गई लेकिन वह वहां से निकल गईं। इस दौरान प्रियंका कुछ दूरी तक पैदल भी चलीं। तड़के चार बजे उन्हें और सांसद दीपेन्द्र हुड्डा को सीतापुर में हिरासत में ले लिया गया। जहां कोई नहीं पहुंचा वहां प्रियंका पहुंच गईं और सबसे पहले पहुंचने वालों में वहीं थीं।

राजनीति के जानकारों की मानें तो इंदिरा गांधी का बेलछी गांव पहुंचना और प्रियंका गांधी का लखीमपुर खीरी के लिए पहुंचने की कोशिश करना, दोनों घटनाओं के वक्त और हालात अलग हैं लेकिन दोनों नेताओं के सियासत करने की शैली में समानता नजर आती है। 

सीतापुर के सिधौली में रोकीं गईं प्रियंका गांधी - फोटो : अमर उजाला
दूसरी घटना

यह महज संयोग ही हो सकता है कि तीन अक्टूबर को गांधी परिवार के दो महत्वपूर्ण शख्स गिरफ्तार हुए हों। तीन अक्तूबर 1977 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था और इसी दिन उनकी पोती और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को भी हिरासत में लिया गया। वे लखीमपुर खीरी जाकर  मृतकों के परिजनों और अन्य किसानों से मिलना चाहती थीं लेकिन प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए उन्हें जाने की इजाजत नहीं दी। प्रियंका अब भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। 

दोनों गिरफ्तारियों में फर्क बस इतना है कि प्रियंका गांधी को पुलिस ने लखीमपुर खीरी कांड के बाद वहां जाते समय समय सीतापुर में हिरासत में लिया था। जबकि इंदिरा गांधी को अधिकार के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के आरोप में दिल्ली में गिरफ्तार किया गया था। इंदिरा पर चुनाव प्रचार में खरीदे वाहनों को लेकर भ्रष्टाचार का आरोप करने का आरोप लगा था। हालांकि अगले दिन कोर्ट में जब उन्हें पेश किया गया तो उनके खिलाफ कोई ठोस सुबूत पेश नहीं होने से कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। 

दादी और पोती दोनों की गिरफ्तारी के संयोग पर पंजाब कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने ट्वीट करते हुए लिखा तीन अक्टूबर 1977 में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी से जनता पार्टी सरकार के पतन की शुरूआत हुई थी। अब उसी दिन यानी तीन अक्टूबर 2021 को प्रियंका गांधी की गिरफ्तारी से देश में भाजपा सरकार के अंत की शुरूआत हो गई है।

 

सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी - फोटो : social media
क्या इंदिरा की तरह सियासत करने लगी हैं प्रियंका
इन दो घटनाओं के जरिए यह समझने की कोशिश की गई है कि क्या प्रियंका गांधी इंदिरा गांधी की तरह सियासत करना सीख गई हैं। छोटे और तराशे हुए एक ही स्टाइल में बने बालों और साड़ी में तो प्रियंका गांधी बिल्कुल अपनी दादी की अक्श नजर आती हैं लेकिन क्या प्रियंका की सियासत की शैली और संघर्ष करने का उनका जज्बा उनकी अपनी दादी इंदिरा गांधी से मेल खाता है? क्या जैसे इंदिरा गांधी ने बेलछी नरसंहार के बाद सत्ता में वापसी की क्या प्रियंका गांधी भी लखीमपुर खीरी कांड के जरिए यूपी में कांग्रेस की खोई जमीन तलाश कर रही हैं?

कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता तो फिलहाल यही मान रहे हैं प्रियंका गांधी यूपी में एक नया कांग्रेस तैयार कर रही हैं। एक वरिष्ठ नेता ने कहा जिस तरह बेलछी नरसंहार से इंदिरा गांधी ने वापसी की थी उसी तरह प्रियंका गांधी के जोश और उनकी सक्रियता ने यूपी चुनाव के लिए कार्यकर्ताओं में जान फूंक दी है। उन्होंने कहा कि प्रियंका कोशिश कर रही हैं कि किसानों की नाराजगी को वोटों में तब्दील किया जाए।

कांग्रेस नेता ने कहा हम जानते हैं कि यहां भाजपा, सपा और बसपा से मुकाबला मुश्किल है क्योंकि बीते कुछ सालों में कांग्रेस का संगठन बहुत कमजोर पड़ा है लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि प्रियंका गांधी को संघर्ष करते देख कार्यकर्ताओं में भी संघर्ष करने का जज्बा भर गया है।

प्रियंका इंदिरा नहीं हो सकतीं
हालांकि बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पहनावा ही नहीं बल्कि बोलने, चाल-ढाल, आक्रामकता, वाकपटुता और व्यंग्य भरे लहजे में भाषण देने और संघर्ष करने के मामले में वे बिल्कुल अपनी दादी पर गई हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जाए कि प्रियंका गांधी इंदिरा गांधी हो सकती हैं।  



 

लोगों से मिलतीं प्रियंका गांधी। - फोटो : amar ujala
पहले प्रियंका तय तो करें उन्हें क्या करना है
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई एक अलग राय रखते हैं। उनका कहना है कि प्रियंका गांधी जबसे राजनीति में आई हैं तब से और खासकर 2019 से ऐसी बातें कही जाती  हैं कि वे इंदिरा गांधी जैसी दिखती हैं। पत्रकार और टिप्पणीकार सब ऐसा सोचते हैं, लेकिन मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि दो वक्त और दो शख्सियतें एक जैसी नहीं हो सकतीं। प्रियंका का एक अलग राजनीतिक व्यक्तित्व हैं और बोलने के मामले में  वे भी आक्रमक हैं। लेकिन दोनों में सबसे बड़ा फर्क यह है कि इंदिरा गांधी को जमी-जमाई कांग्रेस की जमीन मिली थी लेकिन प्रियंका गांधी हो या राहुल गांधी उनकी जमीन अभी खिसकी हुई है।

किदवई मानते हैं कि सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार का नाम होना ही काफी नहीं बल्कि उन्हें 365 दिन और सातों दिन वाली राजनीति करनी होगी। सवाल तो यह है कि क्या वे इंदिरा की तरह राजनीति में अपना असर छोड़ने में कामयाब हो पाएंगी। उनके मुताबिक प्रियंका गांधी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे कांग्रेस में संकटमोचक की भूमिका में है, उनका मकसद अपने भाई के राजनीतिक करियर को सहारा देना है लेकिन वे यह तय ही नहीं कर पा रही हैं कि पार्टी में किस तरह की भूमिका में दिखना चाहती हैं।

किदवई मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चाहें तो भाजपा और सपा का राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकती है लेकिन प्रियंका केवल महासचिव पद तक सिमटी हुई हैं। प्रियंका को अनुशासन में रहकर कड़ाई से यह फैसला करना होगा कि वे राष्ट्रीय राजनीति में रहना चाहती हैं या उत्तर प्रदेश की राजनीति में। प्रियंका को भी अगर कामयाब होना है तो उन्हें उत्तर प्रदेश को तवज्जो देनी होगी।  

 

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी - फोटो : सोशल मीडिया।
तब की और अब की राजनीति में बहुत फर्क
वहीं नलिनी सिंह कहती हैं कि इंदिरा गांधी के 44 साल पहले की जो राजनीति थी वो आज के समय में नहीं है। दोनों भारत में बहुत अंतर है। तब और अब के संचार साधन के मामले में जमीन-आसमान का फर्क है। जब इंदिरा गांधी बेलछी पहुंची तो वहां एक ही फोटोग्राफर वहां था जिसने वहां तस्वीर खीचीं। वहीं प्रियंका ने तेज संचार माध्यम के जरिए अपनी बात कह दी है।

नलिनी सिंह के मुताबिक दोनों नेताओं में तुलना ठीक नहीं है। उनका कहना है कई लोगों के मन में किसानों के संघर्ष के प्रति वेदना होती है, प्रियंका गांधी ने भी उसी तरह की वेदना, सहानुभूति और राजनीतिक सूझबूझ दिखाई है। इंदिरा गांधी का अनुभव ज्यादा था। देखना यह है कि कांग्रेस पार्टी में शोला नहीं तो कम से कम चिंगारी आई है क्या?  अभी तो वे राजनीति में दो साल पहले आई हैं इसलिए अभी तो संघर्ष लंबा है, लेकिन उन्होंने शुरूआत कर दी है।  

पता नहीं इतना बोझ लेने को वे तैयार भी है नहीं
वहीं उत्तर प्रदेश की एक पूर्व महिला सांसद का कहना है कि दादी और पोती की इस तरह तुलना करना प्रियंका पर उम्मीदों का बोझ डालने जैसा होगा जिसके लिए पता नहीं वे तैयार हैं भी या नहीं। उनके सामने काफी बड़ी चुनौती है, क्योंकि यूपी में मोदी-योगी के अलावा मायावती और अखिलेश से भी टकराना है जिन्होंने कांग्रेस को दूर रखा है।

वे कहती हैं, हां इतना जरूर है कि प्रियंका के राजनीति में आने और उनकी सक्रियता के  कारण भाजपा चिंता में दिख रही है, नहीं तो उन्हें इतनी देर हिरासत में रखने और ड्रोन से उनकी निगरानी का क्या मतलब है। यदि प्रियंका अब भी चौबीस घंटें की राजनीति करने लग जाएं तो कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक हमारे पास लौट सकता है।
 
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