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UP Election 2022: अधिक महिलाओं को टिकट देने का कांग्रेस का फैसला, दूसरी पार्टियों के लिए प्रेरणा बनेगा या मजबूरी

प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 20 Oct 2021 06:44 PM IST

सार

प्रियंका गांधी के सोमवार के फैसले को देखें तो यूपी में  403 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस कम से कम 160 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारेगी। कांग्रेस के लिए यह आसान है क्योंकि मौजूदा सात सीटों को छोड़कर बाकी सीटों पर उम्मीदवार उतारे जा सकते हैं, लेकिन असल मुश्किल तो सत्ताधारी भाजपा के साथ है कि वह 325 सीटों पर अपने मौजूदा विधायकों में से कितने के टिकट काटकर महिलाओं को देगी। 
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मतदान की शपथ लेंती महिला मतदाता - फोटो : अमर उजाला
अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देने के कांग्रेस के फैसले ने दूसरी पार्टियों को मुश्किल में डाल दिया है। कांग्रेस की वजह से दूसरे दलों को भी अब महिलाओं को ज्यादा हिस्सेदारी देने के लिए कदम उठाने ही पड़ेंगे। क्या राजनीति में अब अधिक महिलाओं का स्वागत होगा?   विशेषज्ञों का कहना है कि पहले इस बात को समझना होगा कि आखिर आमतौर पर महिलाओं को टिकट देने में पार्टियां हिचकती क्यों हैं?  

विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा इसलिए है क्योंकि माना यह जाता है कि महिलाओं का जीत हासिल करना मुश्किल होता है। वहीं भारत की राजनीति जाति-धर्म पर आधारित है जिसमें महिलाएं मुद्दा नहीं होती हैं। राजनीति में महिलाओं की नेतृत्व क्षमता अभी भी सर्वस्वीकार्य नहीं है और अक्सर पुरुष रिश्तेदारों के हस्तक्षेप के कारण कई सवाल उठाए जाते हैं। उदाहरण के लिए 2017 में, सपा ने 42 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिनमें से केवल सात ही जीत सकीं। ज्यादातर वे ही महिलाएं जीत कर आई हैं जिनका संबंध या तो बाहुबली या संपन्न परिवारों से है या जो किसी राजनेता के परिवार की पत्नी, बहू या बेटी हैं। एक अनुमान के मुताबिक यूपी और बिहार में अधिक संख्या में महिला उम्मीदवार राजनीतिक परिवारों से हैं।


दूसरी पार्टियों को इस बदलाव को स्वीकार करना पड़ेगा 
हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मनीषा प्रियम मानती हैं कि चुनाव में जब महिलाओं को टिकट मिलेगा तो चुनावी प्रक्रिया में वे मुखर होंगी। एक बार जब राजनीतिक प्रतिभा सामने आ जाएंगी तो उन्हें दबाना मुश्किल है। उनका कहना है कि 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देने की बात करके कांग्रेस ने एक बड़ी लाईन खींची है। भाजपा, सपा और बसपा यूपी की स्थापित पार्टी है कांग्रेस का कोई जनाधार नहीं है। इससे एक तरफ जहां कांग्रेस को अपने काडर को संगठित करने का मौका मिलेगा, वहीं दूसरी पार्टियों को भी इस बदलाव को स्वीकार करना पड़ेगा। निश्चित तौर पर उन्हें भी ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को टिकट देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
 
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मतदान की शपथ लेंती महिला मतदाता - फोटो : अमर उजाला
अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देने के कांग्रेस के फैसले ने दूसरी पार्टियों को मुश्किल में डाल दिया है। कांग्रेस की वजह से दूसरे दलों को भी अब महिलाओं को ज्यादा हिस्सेदारी देने के लिए कदम उठाने ही पड़ेंगे। क्या राजनीति में अब अधिक महिलाओं का स्वागत होगा?   विशेषज्ञों का कहना है कि पहले इस बात को समझना होगा कि आखिर आमतौर पर महिलाओं को टिकट देने में पार्टियां हिचकती क्यों हैं?  

विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा इसलिए है क्योंकि माना यह जाता है कि महिलाओं का जीत हासिल करना मुश्किल होता है। वहीं भारत की राजनीति जाति-धर्म पर आधारित है जिसमें महिलाएं मुद्दा नहीं होती हैं। राजनीति में महिलाओं की नेतृत्व क्षमता अभी भी सर्वस्वीकार्य नहीं है और अक्सर पुरुष रिश्तेदारों के हस्तक्षेप के कारण कई सवाल उठाए जाते हैं। उदाहरण के लिए 2017 में, सपा ने 42 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिनमें से केवल सात ही जीत सकीं। ज्यादातर वे ही महिलाएं जीत कर आई हैं जिनका संबंध या तो बाहुबली या संपन्न परिवारों से है या जो किसी राजनेता के परिवार की पत्नी, बहू या बेटी हैं। एक अनुमान के मुताबिक यूपी और बिहार में अधिक संख्या में महिला उम्मीदवार राजनीतिक परिवारों से हैं।

दूसरी पार्टियों को इस बदलाव को स्वीकार करना पड़ेगा 
हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मनीषा प्रियम मानती हैं कि चुनाव में जब महिलाओं को टिकट मिलेगा तो चुनावी प्रक्रिया में वे मुखर होंगी। एक बार जब राजनीतिक प्रतिभा सामने आ जाएंगी तो उन्हें दबाना मुश्किल है। उनका कहना है कि 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देने की बात करके कांग्रेस ने एक बड़ी लाईन खींची है। भाजपा, सपा और बसपा यूपी की स्थापित पार्टी है कांग्रेस का कोई जनाधार नहीं है। इससे एक तरफ जहां कांग्रेस को अपने काडर को संगठित करने का मौका मिलेगा, वहीं दूसरी पार्टियों को भी इस बदलाव को स्वीकार करना पड़ेगा। निश्चित तौर पर उन्हें भी ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को टिकट देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
 

प्रियंका गांधी - फोटो : amar ujala
महिलाओं को कितनी हिस्सेदारी मिलेगी कहना मुश्किल
वहीं चुनाव विश्लेषक भावेश झा का कहना है कि अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि दूसरी पार्टियों को इससे प्रेरणा मिलेगी या नहीं और वे कितनी महिलाओं को टिकट देंगें  लेकिन इतना जरूर है कि वे किसी न किसी रूप में महिलाओं के लिए कुछ करने की कोशिश करेंगे। जैसे घोषणापत्र में महिलाओं के लिए कुछ अहम वादे किए जा सकते हैं।

यदि महिलाएं हारीं तो क्या
एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, टिकट बंटवारे में ज्यादा महिलाओं को ज्यादा हिस्सेदारी देने की कांग्रेस की बात बहुत सकारात्मक है और दूसरे दलों को भी ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन यूपी में कांग्रेस का संगठन मजबूत नहीं है और चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने जमीन पर काम नहीं किया है। कमजोर संगठन और जमीनी काम कम होने के कारण यदि महिलाएं हार जाती हैं, इससे महिलाओं के ‘विनिंग फैक्टर’ और उनकी योग्यता पर सवाल उठेंगे। इसका नुकसान महिलाओं के राजनीतिक भविष्य पर पड़ेगा और भविष्य में महिलाओं के टिकट देने में पार्टियों फिर हिचकेंगी। लेकिन यदि प्रियंका गांधी मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बन जाती हैं तो उनके चेहरे के दम पर दूसरी महिलाओं के लिए भी जीत की राह आसान हो सकती है। 

हालांकि मनीषा प्रियम मानती हैं कि कांग्रेस के लिए यह राह आसान है, क्योंकि वह अभी खाता खोलने के लिए यूपी में चुनाव लड़ रही है। मान लीजिए कि यदि महिलाएं हार भी जाती हैं फिर भी कई ऐसी महिलाओं को चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा जो राजनीतिक परिवार या बाहुलबी परिवार से नहीं है।  कांग्रेस में साफ छवि वाली महिलाएं सामने आएंगी। उनका कहना है इस चुनाव में किसान और महंगाई का मुद्दा छाया रहेगा, लेकिन टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार तक महिलाएं छाई रहेंगी। 


 

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी - फोटो : PTI
महिलाओं ने रणनीति बनानी शुरु की
यूपी के एक प्रमुख पार्टी की एक महिला सांसद ने बताया महिलाएं पूरे जी-जान से संगठन को मजबूत करने के लिए काम करती हैं, लेकिन जब टिकट बंटवारे का समय आता है तो महिलाओं को पीछे कर दिया जाता है। प्रियंका गांधी ने जो कहा है उससे निश्चित तौर पर हमारी पार्टी में भी ज्यादा महिलाओं को टिकट देने की बात की जाएगी। बल्कि कल प्रियंका गांधी की घोषणा के बाद से ही जिला और प्रदेश स्तर पर महिला कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी अध्यक्ष से मिलने की रणनीति बनाने पर काम शुरू कर दिया है।

महिलाओं को टिकट देने में टीएमसी-बीजद आगे
पिछले कुछ सालों में बीजू जनता दल,  तृणमूल कांग्रेस और जद (यू) जैसे कई दलों ने महिला उम्मीदवारों को अधिक टिकट दिए हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में, ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की बात कही थी। इस समय लोकसभा में बीजद की ओर से महिलाओं की हिस्सेदारी 41.6 फीसदी और टीएमसी की 40.9 फीसदी है। इस बार हुए विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने टीएमसी ने 288 में से 48 महिलाओं को मैदान में उतारा था, जो कि दूसरी पार्टियों से तो अलग था लेकिन लोकसभा में उसके अपने ही रिकॉर्ड से कम था।

बिहार के सीएम नीतीश कुमार महिला समर्थक नीतियों के लिए जाने जाते हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में जद (यू) ने 43 महिलाओं को टिकट दिया, लेकिन केवल छह जीतने में सफल रहीं। वहीं कम्युनिस्ट पार्टियों ने 29 उम्मीदवार खड़े किए, जिनमें से केवल एक महिला थी।  



 

यूपी विधानसभा का शीतकालीन सत्र (फाइल फोटो)
चुनाव विश्लेषक भावेश झा बताते हैं कि यह ठीक बात है कि ममता बनर्जी के लिए ज्यादा महिलाओं को टिकट देना फायदेमंद रहा। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि आमतौर पर मतदाता जीतने वाली पार्टी का साथ देता है। जब मतदाता यह समझ लेता है कि कोई पार्टी जीत रही है तभी उसके वादों और कामों का ही जनमानस पर ज्यादा असर पड़ता है और बाकी चीजों का असर होता है। इसलिए कांग्रेस को इस मामले में ज्यादा फायदा इसलिए नहीं होगा कि वह यूपी में पिछली पंक्ति की पार्टी है और उसका संगठन भी मजबूत नहीं है।

2017 में ज्यादा महिलाओं को मौके भाजपा ने दिए
यूपी में, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के विधायकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 11 फीसदी है, जो 1989 में 1.8 फीसदी से काफी बेहतर है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, यूपी के मतदाताओं में महिलाएं 46 फीसदी हैं। 2017 में भाजपा ने राज्य में सबसे अधिक महिलाओं को टिकट दिया था। 384 उम्मीदवारों में से 43 महिलाएं थीं। वहीं सपा ने 33 महिलाओं को टिकट दिया था। कांग्रेस के 114 उम्मीदवारों में से ग्यारह महिलाएं थीं, जबकि मायावती के नेतृत्व वाली बसपा ने सभी 400 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें केवल 19 महिलाएं थीं। सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर दिया सिर्फ 96 महिलाओं को टिकट दिए थे। 

प्रदेश विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र दस फीसदी है जो आजादी के बाद से अब तक सबसे अधिक है। वर्ष 2017 के चुनाव में 403 सदस्यीय विधानसभा में मात्र 38 महिलाएं ही चुनी गईं। पिछले चुनाव में भाजपा से सबसे अधिक 34 महिला चुनी गई थी। जबकि बसपा और कांग्रेस से दो-दो और सपा और अपना दल से एक-एक उम्मीदवार को जीत मिली।

 

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 - फोटो : ANI
उत्तराखंड में भाजपा ने उतारे सिर्फ पांच महिला उम्मीवार
2017 में यूपी में जीतने वाली 34 महिलाएं भाजपा से थीं। जबकि उसी साल अन्य राज्यों में, भाजपा ने कम महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा। उत्तराखंड में 70 उम्मीदवारों में से केवल पांच महिलाएं थीं, जबकि गोवा में,  भाजपा ने 35 में से सिर्फ एक महिला को मौका दिया। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में 23 उम्मीदवारों में से दो महिलाएं थीं, जबकि मणिपुर में 60 में से दो ही महिला उम्मीदवार थीं। लेकिन, 2019 में लोकसभा ने 78 महिला सांसदों को चुना, जिनमें से 40 भाजपा से हैं।  जिससे संसद में लिंग प्रतिनिधित्व में थोड़ा सुधार हुआ। पिछली लोकसभा में 65 महिला सांसद चुनी गई थीं।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि दक्षिणी भारत की कई पार्टियां जो अपनी महिला समर्थक नीतियों के लिए जानी जाती हैं,  वे भी ज्यादा महिलाओं पर भरोसा नहीं करती हैं। 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में, महिलाओं का प्रतिनिधित्व 20 वर्षों में सबसे कम रहा। केवल 12 महिलाएं विधानसभा पहुंच सकीं। 

जीत कर दिखा सकते हैं
बिहार की एक महत्वपूर्ण पार्टी की एक महिला विधायक ने बताया कि ‘मुझे जब टिकट दिया गया तभी से पुरुष साथी कभी सामने मजाक में तो कभी पीठ पीछे यह कहते थे-देखते हैं कैसे जीतती हैं, अरे राजनीति कोई खेल है क्या’। लेकिन हमने भी जीत कर अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष और पार्टी नेता के भरोसे को बढ़ा दिया कि मौका मिले तो हम भी जीत कर दिखा सकते हैं।


 
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