प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट तौर से कह दिया है कि माओवादी हिंसा कम करने के लिए 'विकास और विश्वास' का पुल बना रहे हैं। राह से भटक चुके लोगों को सही रास्ते पर लाएंगे। दूसरी तरफ, नक्सलियों ने अब 'विकास' को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया है। एलडब्ल्यूई एरिया में नक्सलियों द्वारा मोबाइल टावर, सड़क निर्माण, रेलवे, खनन, सरकारी भवन और पुल आदि संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। केंद्र सरकार ने संबंधित राज्य सरकारों से मिलकर नए फॉर्मूले पर काम करना शुरू कर दिया है। नक्सल प्रभावित इलाकों में पहले के मुकाबले अब सुरक्षा बलों के 'ऑपरेशनों' की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ नक्सलियों के लिए सरेंडर पॉलिसी को भी आगे बढ़ा दिया है। नतीजा, दर्जनों खूंखार नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। नक्सलियों को सबसे ज्यादा दिक्कत मोबाइल टावरों से हो रही है। वे नहीं चाहते कि इन क्षेत्रों के लोग बाहरी दुनिया और विकास की नई अवधारणाओं से परिचित हों। केंद्र सरकार ने उनके विरोध को दरकिनार करते हुए पहले से कहीं ज्यादा संख्या में मोबाइल टावर लगवा दिए हैं। इतना ही नहीं, मोबाइल कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए 4072 नए टावर लगाने को मंजूरी दे दी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को 'आईपीएस' के 144 परिवक्षाधीन अधिकारियों के साथ संवाद करते हुए कहा, माओवादी हिंसा को कम करने के लिए सरकार गंभीरता के साथ काम कर रही है। इसका नतीजा भी सामने आ रहा है। गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में नक्सलवादी घटनाओं में कमी आ रही है। सुरक्षा बलों ने अपने ऑपरेशन बढ़ा दिए हैं। कई जगहों पर नई बटालियन स्वीकृत की गई हैं। नक्सलियों की मुहिम कमजोर पड़ती जा रही है। बहुत से नक्सली, सरकार की नीतियों पर भरोसा कर आत्मसमर्पण कर रहे हैं। गृह मंत्रालय ने इन इलाकों में सीएपीएफ बटालियनों की तैनाती के अलावा हेलीकॉप्टर और यूएवी भी मुहैया कराए हैं। पुलिस बलों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। नक्सलियों को नई भर्ती के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं। कई जगहों पर नक्सली, ग्रामीण बच्चों को गुमराह कर उन्हें अपने समूहों में शामिल कर रहे हैं। उन्हें हथियारों की ट्रेनिंग दी जा रही है। आईईडी विस्फोट करना सिखाया जा रहा है। इसके अलावा नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों की मूवमेंट का पता करने के लिए बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के नक्सल क्षेत्र में तैनात सीआरपीएफ के एक अधिकारी बताते हैं, माओवादियों के सामने इस वक्त हर तरह का संकट है। न तो उन्हें रुपया पैसा मिल पा रहा है और न ही नए लोग। सुरक्षा बलों का घेरा बढ़ता जा रहा है। वहीं सरकार ने विकास कार्य तेज कर दिए हैं। नक्सलियों को सबसे ज्यादा दिक्कत 'विकास' कार्यों को लेकर है। वे जानते हैं कि जैसे-जैसे विकास आगे बढ़ेगा, उनके साथी अलग होते जाएंगे। जिन गांवों के बल पर वे सरकारों को चुनौती देते हैं, वहां से उन्हें ज्यादा सहायता नहीं मिल पा रही है। लोगों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। वहां के लोग अपने बच्चों को लेकर बहुत चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे शिक्षित हों। इसके लिए केंद्रीय सुरक्षा बलों ने सभी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सिविक एक्शन प्रोग्राम शुरू किया है। सुरक्षा कर्मी, ग्रामीणों के बच्चों को पढ़ा रहे हैं। आईटीबीपी ने नक्सल प्रभावित इलाकों में कई अच्छे हॉकी प्लेयर तैयार कर दिए हैं। नक्सली, इससे घबरा गए हैं। वे नहीं चाहते कि जंगलों में मोबाइल टावर लगें। उनके द्वारा सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं टावरों को पहुंचाया जाता है। इसके अलावा खनन अवसंरचना, रेलवे की संपत्तियां, सरकारी भवन, स्कूल, सड़क व पुलों आदि पर हमले कर उन्हें क्षति पहुंचाई जा रही है।
राज्य मंत्री नित्यानंद राय के मुताबिक, केंद्र सरकार इन इलाकों की स्थिति पर गहनता से निगरानी रख रही है। वामपंथी उग्रवाद से मुकाबला करने के लिए जो बहुआयामी रणनीति अपनाई है, वह कारगर साबित हुई है। आंध्र प्रदेश, बिहार छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा व तेलंगाना के नक्सल प्रभावित इलाकों में स्थित आर्थिक अवसंरचनाओं पर नक्सलियों के हमलों की संख्या कम हुई है। साल 2018 में इनकी संख्या 60, 2019 में 64, 2020 में 47 और इस साल 30 जून तक 24 हमले हुए हैं। उगाही के लिए अपहरण की घटनाएं भी नहीं बढ़ रही हैं। हिंसा एवं मौतों का आंकड़ा भी कम हो रहा है। भारत सरकार ने इन इलाकों में 14630 किलोमीटर लंबी सड़कों के निर्माण कार्य को मंजूरी दी थी। करीब 9164 किलोमीटर सड़कों का कार्य पूरा हो गया है। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में लोगों के वित्तीय समावेशन के लिए 1236 बैंक शाखाएं तथा 1077 एटीएम खोले गए हैं। इतना ही नहीं, 14230 बैंकिंग कॉरेसपोंडेंट की नियुक्ति की गई है। विशेष केंद्रीय सहायता स्कीम के तहत 2598.24 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। इन सब कार्यों के द्वारा नक्सली अब अकेले पड़ते जा रहे हैं। उनके पास संसाधनों की भारी कमी है, इसलिए आए दिन नक्सली सरेंडर कर रहे हैं।